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गिरीश्वर मिश्र
आज विकसित और प्रगतिशील देशों में शोध पर बड़ा बल दिया जाता है। वहाँ शिक्षा और शोध पर काफ़ी खर्च होता है और शोध गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरता है। ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में उन देशों की वैश्विक पहचान है। पड़ोसी देश चीन की शोध में प्रगति आशातीत रूप से उल्लेखनीय है जहाँ आज अनेक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय हैं। भारतीय संदर्भ में शोध की स्थिति आज दयनीय हो रही है हालांकि यहाँ तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय तब थे जब अन्यत्र इसकी कल्पना भी नहीं थी। आज हम शिक्षा और शोध में पिछड़ गए हैं। न बजट में प्रावधान है और न शिक्षा संचालन व्यवस्था ही संतोषजनक है।
शिक्षा में हमने इतने तरह के स्तरीकरण कर रखे हैं कि भारतीय शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन कठिन है। आज कई तरह के निजी, केंद्रीय सरकार द्वारा संचालित, राज्य शासन द्वारा संचालित, अर्ध सरकारी, डीम्ड आदि अनेक किस्म के एक हज़ार से अधिक विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षा के अनेक संस्थान और हजारों महाविद्यालयों का विशाल संजाल तो खड़ा है परंतु अध्यापकों और शिक्षा के लिए जरूरी संसाधनों का अधिकांश शिक्षा केंद्रों पर घोर अभाव है। सरकारी संस्थाओं की स्थिति यदि व्यवस्थागत पेचीदगी का शिकार होकर असंतोषजनक है तो निरंकुश निजी शिक्षा संस्थान व्यापार के तर्ज पर भारी शुल्क उगाही कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं।
शोध की दृष्टि से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विषय कई अर्थों में सार्वभौमिक होते हैं। उनके सिद्धांत बहुत हद तक ऐसी सामग्री से जुड़े होते हैं जो स्थिर होती हैं और उनको लेकर सामान्यीकरण की अधिक संभावना होती है। उनका ज्ञान बहुत हद तक संचयी प्रकृति का भी होता है। ज्ञान पाने वाला और ज्ञान की वस्तु में स्पष्ट भेद होता है- वैज्ञानिक चेतन प्राणी है और पदार्थों की दुनिया उससे भिन्न होती है। प्राकृतिक विज्ञानों के ज्ञान को पृथ्वी पर हर कहीं एक ही कसौटी पर मापा, जांचा और परखा जा सकता है (अन्तरिक्ष और दूसरे ग्रहों की बात जरूर भिन्न है )। दूसरी तरफ़ मानविकी और समाज विज्ञान का स्वभाव भिन्न है। इनके विषय समाज, संस्कृति, परंपरा, आदर्श और मूल्य जैसे मानवीय सरोकारों से घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं और उनमें अध्येता और विषयवस्तु दोनों मनुष्य होते हैं।
पश्चिम में समाज विज्ञानों के पुरोधाओं ने प्राकृतिक विज्ञानों के तर्ज पर विज्ञान की ही विधि को अपने विषय में लागू किया । विज्ञान कहलाने के लोभ में मानव व्यवहार और मानव समाज को ‘वस्तु’ मान कर अध्ययन शुरू हुआ। यद्यपि सामाजिक विज्ञान परिस्थिति सापेक्ष्य ज्ञान ही दे पाते हैं और अध्ययन विषय भी देश काल के साथ बदलता रहता है। इसलिए अब गुणात्मक, आख्यानपरक और निर्वाचन की पद्धतियों की ओर झुकाव बढ़ रहा है। फिर भी व्यापकि स्वीकृति इंद्रियानुभविक विधि, मापन और सांख्यिकी के विश्लेषण की है। इनकी सहायता से एक सुगम परिपाटी चल पड़ी। अब विधि की जरूरतों को पूरा कर पीएचडी की उपाधि त्वरित गति से अर्जित होने लगी। शोध सिर्फ़ शोध के लिए किया जाने लगा न कि ज्ञान वृद्धि या किसी समस्या के समाधान के लिए। मानविकी में शोध अधिकाधिक वर्णनात्मक होते गए और उसे भी कुछ ढर्रों पर चला दिया गया। शोध की मौलिकता, देशज ज्ञान से रिश्ता, सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ाव और उपयोगिता के सरोकार लगातार उपेक्षित होते गए।
भारत की देशज ज्ञान परंपरा विशाल है और उसमें शोध और अनुसंधान की व्यवस्था है। न्याय-शास्त्र ‘प्रमाण’ यानी अध्ययन विधि की ही चिंता करता है।
हमारे विश्वविद्यालयों में शोध का आरम्भ औपनिवेशिक भारत में अंग्रेज़ों द्वारा किया ग़या। यूरोप और अमेरिका के सिद्धांतों, विचारों और विधियों का प्रभुत्व ऐसा रहा कि भारतीय विश्वविद्यालयों में समाज विज्ञान के विभिन्न विषयों में विदेशी ज्ञान का वर्चस्व हो गया। आज भी अधिकांश विषयों की पाठ्य पुस्तकें और ज्ञान की सामग्री उसी तरह की है। भारतीय समाज उतना ही प्रासंगिक होता है जितना आंकड़ों को पाने के लिए जरूरी है। ऐसा ज्ञान न पश्चिमी देशों के काम का होता है न अपने देश के। ऐसे में दुहराव तथा पिश्टपेषण का बोलबाला हो रहा है। इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि भारतीय शोध कार्यों की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में कमतर है। इन शोध कार्यों की उपयोगिता, प्रमाणिकता और ज्ञान में योगदान बड़ा ही सीमित है। इसलिए प्राध्यापक वर्ग, नीतिनिर्धारकों और शोध के उपभोक्ताओं की चिंता जायज़ है।
जनसंख्या बढ़ने के साथ शिक्षा संस्थानों की संख्या तो जरूर बढ़ी है परंतु उनकी गुणवत्ता में गिरावट चिंता का कारण है। संस्थानों की कार्य-संस्कृति पर राजनीति हावी है। शिक्षा केंद्र में अकादमिक कार्य, वैचारिक प्रयास और सृजनशीलता की जगह उत्सवप्रियता का अतिरेक है जिससे क्षणिक उत्तेजना और संतुष्टि तो मिलती है परंतु अध्ययन-अध्यापन हाशिये पर चला जा रहा है। शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और विचार-विमर्श के वातावरण से विवेकवान समालोचक की दृष्टि लुप्त हो रही है। वार्ता, वाद-विवाद और शास्त्रार्थ की जगह अनुकीर्तन से ज्ञान में वृद्धि की आशा व्यर्थ है।
तमाम दबावों के बीच हमारे विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों से निकलने वाले शोध की मान्यताओं और प्रतिष्ठा के साथ पूरी तरह न्याय नहीं कर पा रहे हैं। शोधार्थियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है पर उसी के साथ शोध से जुड़े नैतिक प्रश्न उलझते जा रहे हैं। साहित्य चोरी (प्लैग्रिज्म) की घटनाएँ बढ़ रही हैं, शोध निदेशकों द्वारा शोषण की घटनाएँ भी हो रही हैं। व्यवस्था की कमजोरी के चलते शोध कार्य में पारदर्शिता में घट रही है। शोध कार्य एक कृत्य (रिचुअल) का रूप लेता जा रहा है जिसमें कोल्हू के बैल की तरह बँधी-बंधाई लीक पर चलना ही शोध की पद्धति बनती जा रही है। जिज्ञासा, प्रश्नाकुलता और कल्पनाशीलता पिछड़ रही है। इसका कारण संसाधनों और सुविधाओं का अकाल तो है पर उसका समुचित वितरण न होना भी क्षोभ का कारण बन रहा है।
यह भी एक बिडंबना है कि जिस भारत में ज्ञान को पवित्र और क्लेशों से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया वहाँ आईआईटी जैसे उच्च संस्थानों में मानसिक रुग्णता और आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। अनुशासित जिज्ञासा से शोध का आरंभ होता है और ज्ञान के संधान के साथ यह यात्रा आगे बढ़ती है। कहा गया है- विद्या से विनय और विनय से पात्रता, फिर पात्रता से समृद्धि और तब सुख मिलता है। आज इस सूत्र को फिर से दुहराने और अपनाने की जरूरत है।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
