गोविंदा मिश्रा

भारत की सभ्यता शांति, सह-अस्तित्व और विविधता की प्रतीक रही है। फिर भी, स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक, आतंकवाद ने बार-बार इस शांति की नींव को हिलाने की कोशिश की है। समय के साथ आतंक का स्वरूप बदलता गया — सीमापार से आता बंदूकधारी अब साइबर नेटवर्क और प्रयोगशालाओं के पीछे छिपा हुआ है। लेकिन इस बदलते परिदृश्य के बीच भारत की सुरक्षा नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति में भी एक गहरा परिवर्तन आया है।

आज आतंक केवल किसी भूगोल का विषय नहीं, बल्कि विचारधारा का प्रश्न बन चुका है। और इस वैचारिक युद्ध में भारत ने अब केवल प्रतिकार करना नहीं, बल्कि रोकथाम का मंत्र अपना लिया है।
लाल क़िले से फरीदाबाद तक – आतंक की साजिशें और संकेत
हाल ही में फरीदाबाद में 2,900 किलोग्राम विस्फोटक और अत्याधुनिक हथियारों की बरामदगी ने पूरे देश का ध्यान खींचा। यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं था, बल्कि एक ऐसे नेटवर्क की झलक थी जो भारत के दिल पर हमला करने की तैयारी में था। जांच में सामने आया कि इस साजिश का लक्ष्य लाल क़िला था — भारत के गौरव और संप्रभुता का प्रतीक।
यह घटना केवल एक संभावित विस्फोट नहीं थी; यह उस वैचारिक युद्ध का हिस्सा थी जो भारत के मनोबल को तोड़ना चाहता है।
फरीदाबाद की यह कार्रवाई एक प्रतीकात्मक प्रश्न भी उठाती है — क्या आतंक अब नया चेहरा पहन चुका है?
सफ़ेद कोट वाला आतंकी – “व्हाइट कॉलर जिहाद” का उदय
पहले आतंकियों की पहचान सीमापार से आए प्रशिक्षित बंदूकधारियों या गरीब युवाओं से होती थी। लेकिन अब यह चेहरा बदल गया है।
फरीदाबाद में पकड़ा गया मुख्य आरोपी डॉक्टर था, जिसने अपनी शिक्षा को विनाश का औजार बना लिया।
यह है “व्हाइट कॉलर जिहाद” — वह दौर जहाँ आतंकवाद अब अज्ञानता से नहीं, बल्कि वैचारिक प्रदूषण और तकनीकी दक्षता के दुरुपयोग से जन्म ले रहा है।
इस नए स्वरूप ने सुरक्षा एजेंसियों की चुनौतियाँ कई गुना बढ़ा दी हैं।
जहाँ पहले बॉर्डर सिक्योरिटी पर फोकस था, अब साइबर निगरानी, प्रयोगशाला जांच, और ऑनलाइन कट्टरपंथ के नेटवर्क से भी निपटना पड़ रहा है।
गुजरात की “राइसिन साजिश” और विज्ञान का दुरुपयोग
गुजरात में “राइसिन साजिश” का पर्दाफाश भी इस नए पैटर्न को स्पष्ट करता है।
राइसिन एक घातक रासायनिक विष है जिसे कुछ कट्टरपंथी पेशेवरों ने आतंक का उपकरण बनाने की कोशिश की थी।
यह विज्ञान की उस विकृत दिशा की याद दिलाता है जहाँ ज्ञान का प्रयोग मानवता की रक्षा नहीं, बल्कि उसके विनाश के लिए किया जा रहा है।
मोदी सरकार के दौरान गुजरात एटीएस ने इस साजिश को बिना किसी जनहानि के समाप्त किया।
यह घटना केवल पुलिसिया सफलता नहीं थी — यह संदेश था कि भारत अब केवल प्रतिक्रियाशील नहीं, बल्कि सक्रिय सुरक्षा रणनीति अपनाने वाला राष्ट्र बन चुका है।
अतीत की कमजोरियाँ: जब आतंक ने आत्मविश्वास पर प्रहार किया
कांग्रेस के शासनकाल में भारत ने आतंक का सबसे भयावह दशक देखा।
मुंबई, दिल्ली, वाराणसी, हैदराबाद — कोई शहर अछूता नहीं रहा।
2008 में 26/11 के हमले ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया, लेकिन राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ औपचारिक और कमजोर रहीं।
बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद का दृश्य आज भी स्मृति में ताज़ा है।
जब देश एक पुलिस अधिकारी की शहादत पर गर्व कर रहा था, तब राजनीतिक नेतृत्व आतंकियों के प्रति “संवेदना” दिखाने में लगा था।
यही वह दौर था जब “हिंदू आतंकवाद” जैसी संज्ञा गढ़ी गई — जिसने न केवल सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल तोड़ा, बल्कि वास्तविक जिहादी नेटवर्क को ढकने का काम किया।
राजनीतिक तुष्टीकरण और भ्रमित सेक्युलरिज़्म ने भारत की आंतरिक सुरक्षा को कमजोर किया।
जिसे वोट बैंक की राजनीति कहा गया, वही बाद में राष्ट्रीय खतरा साबित हुआ।
मोदी युग में निर्णायक नीति और सशक्त एजेंसियाँ
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सुरक्षा तंत्र ने न केवल तकनीकी, बल्कि नैतिक आत्मविश्वास भी हासिल किया।
आज एजेंसियाँ बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के काम कर रही हैं।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA), इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB), और एटीएस यूनिट्स को निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई है।
इस स्वतंत्रता का परिणाम यह है कि कई आतंकी नेटवर्क अपनी साजिशें पूरी करने से पहले ही ढह जाते हैं।
सरकार ने यह सिद्ध किया है कि “आतंकवाद से लड़ाई संवेदनशीलता से नहीं, दृढ़ता से जीती जाती है।”
अब नीति स्पष्ट है — “जो भारत को धमकाएगा, उसे खोजकर समाप्त किया जाएगा।”
डिजिटल जिहाद – आतंक का नया युद्धक्षेत्र
21वीं सदी में आतंकवाद का सबसे शक्तिशाली हथियार है — सूचना।
एन्क्रिप्टेड चैट्स, सोशल मीडिया, डार्क वेब, और क्रिप्टो फंडिंग ने इस युद्ध को जटिल बना दिया है।
अब आतंकवादी न तो सीमा पार से आते हैं, न किसी एक देश के आश्रय में रहते हैं; वे इंटरनेट की अदृश्य दुनिया में छिपे होते हैं।
यह “डिजिटल जिहाद” है — जहाँ विचारों को विषैला बनाकर युवाओं को हथियार बनाया जाता है।
भारत ने इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए साइबर इंटेलिजेंस नेटवर्क और तकनीकी निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ किया है।
ड्रोन निगरानी, डाटा एनालिटिक्स और एआई-सक्षम सुरक्षा उपकरण अब देश की रक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं।
सीमाओं की सख्ती और पड़ोसी देशों की भूमिका
भारत ने आतंक की जड़ें केवल भीतर नहीं, बल्कि सीमाओं के पार भी खोजी हैं।
बांग्लादेश सीमा पर मुरशीदाबाद जैसे इलाके इस साजिश के उदाहरण हैं, जहाँ 150 से अधिक बम बरामद किए गए।
यह बताता है कि सीमापार नेटवर्क अब भी सक्रिय हैं, और उन्हें रोकने के लिए केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि खुफिया स्तर पर कड़े कदम आवश्यक हैं।
भाजपा सरकार ने सीमाओं की सुरक्षा को राष्ट्रहित से जोड़ा है —
जहाँ पहले सुरक्षा मुद्दा केवल रक्षा मंत्रालय तक सीमित था, अब यह “राष्ट्रीय विकास” की शर्त बन चुका है।
एक सुरक्षित सीमा ही समृद्ध समाज की नींव है — यह विचार अब नीति का हिस्सा है।
राजनीतिक विमर्श और राष्ट्रवाद का पुनर्जन्म
भारत की राजनीति में “राष्ट्रवाद” शब्द को लंबे समय तक गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया।
कभी इसे आक्रामकता कहा गया, कभी सांप्रदायिकता।
लेकिन आज का भारत इसे अपनी पहचान मानता है।
यह राष्ट्रवाद दूसरों से घृणा नहीं, बल्कि आत्म-सुरक्षा और आत्म-गौरव का प्रतीक है।
भाजपा ने इस भावना को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा है — और यही भारत की सुरक्षा दृष्टि का वैचारिक आधार बन गया है।
नागरिक समाज की भूमिका: सुरक्षा अब जनसहयोग का विषय
सुरक्षा अब केवल सरकार या सेना की जिम्मेदारी नहीं रही।
डिजिटल युग में हर नागरिक एक प्रहरी बन सकता है — अपने आस-पास की गतिविधियों, सोशल मीडिया पर फैलती नफरत, या संदिग्ध नेटवर्क की पहचान में।
नए भारत में यह समझ बढ़ रही है कि राष्ट्र की रक्षा केवल हथियारों से नहीं, चेतना से होती है।
“देखो, बताओ, सतर्क रहो” जैसे अभियानों ने समाज में सुरक्षा संस्कृति को स्थापित किया है।
जब नागरिक सहयोगी बनते हैं, तो आतंकी नेटवर्क के लिए जगह अपने आप घट जाती है।
लाल क़िला और भारत की आत्मा का प्रतीकवाद
लाल क़िले पर संभावित हमला केवल एक इमारत पर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा पर हमला था।
यह वही स्थान है जहाँ से तिरंगा लहराता है, जहाँ से आज़ादी का उद्घोष हुआ था।
इस पर हमला भारत की एकता, साहस और संप्रभुता को चुनौती देना था।
परंतु यह साजिश विफल रही — क्योंकि अब भारत में ऐसा नेतृत्व है जो “सहनशीलता” को कमजोरी नहीं, बल्कि “सजगता” के साथ जोड़ता है।
सतर्क भारत, सुरक्षित भविष्य
भारत ने आतंकवाद के खिलाफ केवल सुरक्षा रणनीति नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन खड़ा किया है।
यह आंदोलन बताता है कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं से नहीं, विचारों से भी तय होती है।
फरीदाबाद, मुरशीदाबाद, और गुजरात की घटनाएँ चेतावनी हैं कि खतरा अभी टला नहीं है, लेकिन भारत की तैयारी पहले से कहीं अधिक परिपक्व है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश ने स्पष्ट कर दिया है कि
“हम अब केवल प्रतिक्रिया नहीं देंगे — हम रोकेंगे, पहचानेंगे और समाप्त करेंगे।”
यह वही भारत है जो अब भय में नहीं जीता, बल्कि विश्वास में साँस लेता है।
सतर्क नागरिक, सशक्त एजेंसियाँ और दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति —
यही हैं नए भारत के तीन कवच, जिनसे आतंक का हर वार निष्फल होता है।
