-प्रणय विक्रम सिंह
ईरान में आज जो घट रहा है, वह किसी एक मुल्क की सियासी हलचल नहीं, यह इतिहास की छाती पर उठती हुई एक सभ्यतागत बगावत है। यह उस पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है, जिसे यह समझा दिया गया था कि मजहबी सत्ता ढांचे हमेशा के लिए समाजों की आत्मा पर कब्जा कर सकते हैं। नहीं, जब किसी कौम की तारीख, तहजीब और इंसानी आजादी को कुचला जाता है, तो इन्कलाब लाजिमी हो जाता है।
ईरान आज इस इन्कलाब की अग्रिम चौकी है। दशकों तक जिस इस्लामवादी सत्ता-व्यवस्था ने शरीयत, डर और वैचारिक निगरानी से जिंदगियों को जकड़े रखा, वही आज अपने ही अवाम की जागी हुई चेतना से घिर चुकी है। यह बगावत हमें यह याद दिलाती है कि किसी भी क़ौम का डीएनए मिटाया नहीं जा सकता। ईरान का डीएनए पर्शिया है। साइरस की सहिष्णुता, जरतुस्त्र की नैतिक ज्वाला और अवेस्ता की रूह हर कोने में समाई है। अरब से आई इस्लामवादी सत्ता-रचना ने इस पहचान पर परदे डाले, प्रतीकों को बदला, स्मृतियों को हाशिए पर धकेला मगर उसे बुझा नहीं सकी। आज वही भूली-बिसरी स्मृति फिर दहक रही है। अफगानिस्तान से लेकर मिस्र और यूरोप तक सवाल गूंज रहा है कि क्या मजहबी पहचान सभ्यतागत पहचान से बड़ी हो सकती है?
इस्लामवादी साम्राज्यवाद ने पर्शिया को ईरान बनाया और इस बदलाव में केवल नाम नहीं बदला, एक सभ्यता को परदे के पीछे धकेल दिया गया। पर्शिया वह धरती थी जहां नैतिकता, सहिष्णुता और मानवीय गरिमा राज्य-दृष्टि का आधार थीं। सत्ता-रूप में उभरी मजहबी विचारधारा ने इस प्राचीन पहचान को पूर्व-इस्लामी कहकर संदिग्ध बनाया। भाषा बदली, प्रतीक बदले, इतिहास की किताबों से स्मृति छीनी गई। आज ईरान की सड़कों पर उठती आग उसी दबाई गई पर्शियन आत्मा की पुकार है कि हम वही हैं जो थे। हमारी रूह को नाम बदल कर मिटाया नहीं जा सकता।
दरअसल, इस्लामी साम्राज्यवाद की बर्बरता उसकी आस्था, उसके सत्ता-रूप में दिखाई देती है। इतिहास गवाह है कि जब ‘मजहब’ तलवार बनकर सभ्यताओं पर टूटा, तब नगर उजड़े, पुस्तकालय जले, मंदिर-प्रतिमाएं तोड़ी गईं, भाषाएं हाशिये पर डाली गईं और स्त्रियों की देह को नियंत्रण का मैदान बनाया गया। इनके द्वारा विविधता को ‘कुफ्र’, स्मृति को ‘जाहिलियत’ और असहमति को ‘बगावत’ कहकर कुचला गया। इस साम्राज्यवादी विस्तार ने संवाद नहीं, दहशत रची, आस्था नहीं, आज्ञाकारिता मांगी और न्याय नहीं, अधीनता थोपी। इतिहास गवाह है कि ‘मजहबी’ अंधड़ ने इंसान से उसकी जड़ें, उसकी भाषा, उसकी कला और उसकी गरिमा छीनने की कोशिश की और वहीं से प्रतिरोध की नैतिक जरूरत जन्मी।
यहां यह समझना जरूरी है कि इस्लामवाद यानी मजहब का सत्ता-रूप अक्सर सभ्यता से टकराता है। उसकी भाषा द्वैत रचती है ‘काफ़िर’ और ‘मोमिन’, ‘दारुल-इस्लाम’ और ‘दारुल-हरब’। इस दृष्टि में स्थानीय परंपराएं, स्त्री की स्वतंत्रता, कला, स्मृति और विविधता संदेह के घेरे में आ जाती हैं। जहां यह वैचारिक कठोरता सत्ता बनती है, वहां इंसान अपनी जड़ों से काटा जाता है। यह धर्म नहीं विचारधारा का कब्जा है। इसीलिए जब ईरान की बेटियां सरे-आम बुर्क़ा जलाती हैं, तो वे कपड़ा नहीं डर और नियंत्रण को आग लगाती हैं।
वस्तुत: यह केवल स्त्री-अधिकार का एलान नहीं, यह उस देह पर थोपे गए मजहबी पहरे के खिलाफ खुली बगावत है। तेहरान की यह लपटें काबुल, कराची और गाजा तक जमीरों को झकझोर रही हैं। और जब शेर और अग्नि वाला पुराना फारसी झंडा फिर से उठता है, तो वह अरब-केंद्रित इस्लामवादी पहचान के विरुद्ध सभ्यता की चुनौती बन जाता है। वह तुर्की, मध्य एशिया और उत्तर अफ्रीका तक फैले समाजों को उनकी-उनकी भूली हुई सभ्यताओं की याद दिला रहा है।
यह जंग किसी आस्था से नहीं इस्लामवादी अधिनायकवाद से है। यह ऐलान है कि मजहब निजी है, मगर सभ्यता जनता की। और जब कोई मजहबी सत्ता सभ्यता को निगलने बढ़े, तो रहम नहीं बगावत उसका जवाब होती है। ऐसे में आज ईरान केवल एक देश नहीं, एक दर्पण बन चुका है और दुनिया उसके सामने खड़ी दर्शक। इस दर्पण में हर समाज अपनी शक्ल देख सकता है, कहीं दबाई गई स्मृतियां, कहीं कुचली गई अस्मिताएं, कहीं थोपे गए मजहबी पहरे। सवाल यह नहीं कि ईरान में क्या हो रहा है! सवाल यह है कि दुनिया उस प्रतिबिंब को देखकर क्या करेगी? नजर चुराएगी या सच स्वीकार करेगी। क्योंकि जब कोई सभ्यता अपने भीतर झांक लेती है, तब इतिहास दर्शक नहीं रहता, भागीदार बन जाता है। ईरान की यह आग इसलिए महज तेहरान की नहीं यह वैश्विक जमीर की दहकती मशाल है।
(लेखक, स्तम्भकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
