
नई दिल्ली | 27 जनवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठन प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने मंगलवार को पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का जिक्र करते हुए कहा कि ज्ञान का विकास तीन स्तंभों सटीक प्रलेखन, निष्पक्ष व्याख्या और लोक-समुदायों के प्रति सम्मान पर टिका है।

जे नंद कुमार ने यह बात आज नई दिल्ली स्थित इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कला निधि विभाग की स्थापना दिवस और बसंत पंचमी के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम पुस्तक लोकार्पण, प्रदर्शनी एवं वसंत उत्सव के अवसर पर कही। कार्यक्रम की शुरुआत से पहले कई सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं।

मुख्य अतिथि के रूप में उन्होंने कहा, पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में उपचार एक आध्यात्मिक साधना है, जहां शरीर के साथ-साथ बुद्धि और आत्मा का भी ध्यान रखा जाता है। अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में उपचार का दृष्टिकोण ‘समग्र’ है। यह ज्ञान आयुर्वेद की तरह ही समृद्ध है, किंतु इसे अब तक विधिवत संहिताबद्ध नहीं किया गया है, जो कि समय की मांग है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा के संहिताबद्ध विकास के बीच, हमारी लोक-परंपराओं में छिपे वज्रवल्ली और ब्राह्मी जैसे अन्य पौधों का ज्ञान लुप्तप्राय हो रहा है। इस पुस्तक के माध्यम से इन औषधियों का वैज्ञानिक संकलन एक दूरदर्शी कदम है। कलानिधि विभाग की यह कोशिश सराहनीय है, जो हमारी समृद्ध विरासत को भविष्य की पीढ़ी के लिए ‘आत्मविश्वास और जिम्मेदारी’ के एक नए सेतु के रूप में प्रस्तुत करती है।
इस दौरान, भारत की पुरानी ज्ञान परंपरा और डिजिटल शोध से जुड़ी पर 4 पुस्तकों और एक पत्रिका का लोकार्पण तथा ‘विकसित भारत’ की अवधारणा पर केंद्रित एक प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया। इन पुस्तकों की लेखिका जवाहर लाल नेहरू की सह-प्राध्यापक की एवम ऐंथ्रोपोस फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ सुनीता रेड्डी हैं।
सम्माननीय अतिथि के रूप में आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि हमें परंपराओं का गर्व होना चाहिए, लेकिन समय के साथ आगे बढ़कर दुनिया के साथ तालमेल बिठाना चाहिए। केवल पुरानी बातों में ही सिमटे रहना हमें पीछे छोड़ सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक विज्ञानों को भी आधुनिक विज्ञान के समान ही प्रमाणित किया जाना चाहिए।
सचिव ने बताया कि आयुष मंत्रालय ‘आयुष ग्रिड’ परियोजना पर , चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान को सुलभ बनाने के लिए एक ‘एआई चैटबोट’ विकसित करने पर तथा डब्ल्यूएचओ, आईटीयू और डब्ल्यूआईपीओ के साथ मिलकर वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा में एआई के उपयोग का नेतृत्व कर रहा है।
आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने आयुर्वेद और योग जैसी भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों के बारे में बताते हुए कहा कि सरकार को इन विद्याओं को भी आधुनिक विज्ञान जैसा ही आधार देना चाहिए। इसके अलावा, आधुनिक चिकित्सा पद्धति (एलोपैथी) के डॉक्टरों को भी आयुर्वेद और योग जैसी पद्धतियों को चिकित्सा विज्ञान में एकीकृत करने के बारे में सोचना चाहिए|
राय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर कहा कि यह आधुनिक शब्द तो सिखा सकता है लेकिन पुराने और पारंपरिक ज्ञान के शब्दों की रचना के बारे में नहीं बता सकता। इसलिए नई चुनौती हमें समझनी चाहिए और नई चुनौती नए शब्दों की रचना में है, क्योंकि नए शब्द की रचना अगर होती है तो हम विश्व की यात्रा कर सकेंगे, नहीं तो हम सोचते रह ही जाएंगे।
आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि पुस्तक केवल शब्दों का संकलन नहीं होती बल्कि विचारों, अनुभवों और संवेदनाओं का जीवन संसार है।
उन्होंने कहा कि पुस्तकालय किसी भी शैक्षणिक संस्थान या शोध संस्थान के हृदय होते हैं। पुस्तकालय में कितना स्पंदन है उसी आधार पर यह बात निश्चित होती है कि उस संस्थान का स्वास्थ्य कैसा है क्योंकि हम सब जानते हैं कि हमारे दिल का स्पंदन अगर ठीक रहता है तो हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है।
कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और आयुर्वेद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली 3 किताबें खासतौर पर पूर्वोत्तर राज्यों (मणिपुर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश) की जड़ी-बूटियों और वहां के पुराने इलाज के तरीकों पर लिखी गई हैं।
इनमें पहली किताब ग्रीन विजडम, जो मणिपुर की औषधीय उपचार परंपराएं पर आधारित है। दूसरी पुस्तक रूटस ऑफ विजडम, यह सिक्किम की अलिखित औषधीय परंपराओं पर है। तीसरी पुस्तक व्हिस्पर ऑफ द फॉरेस्ट, जो अरुणाचल प्रदेश की गैर-कोडीकृत हर्बल हीलिंग पर आधारित है।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं की सुविधा के लिए ‘सूक्ष्मचलित पांडुलिपियों’ की एक डिजिटल सूची (ई-विवरण पंजिका) के कई खंड जारी किए गए। इसमें आईजीएनसीए की प्रतिष्ठित पत्रिका के ‘वसंत पंचमी अंक 2026’ भी शामिल है।
इस मौके पर विशिष्ट अतिथि के रूप में दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रतीक शर्मा सहित अन्य गणमान्य जन मौजूद रहे।
रामबहादुर राय इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की। डॉ. जोशी ने उद्घाटन वक्तव्य दिया, जबकि प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़ ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी
