– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को गंभीर असमंजस में डाल दिया है। सरकार इसे समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा सुधार बता रही है, किंतु विश्वविद्यालय परिसरों में इसका असर इसके ठीक उलट दिखाई दे रहा है।
वस्तुत: देश के अनेक हिस्सों में छात्र, शिक्षक और शैक्षणिक संगठन सड़कों पर उतर आए हैं। दिल्ली के जेएनयू और डीयू में कक्षाओं का बहिष्कार, मुंबई के आईआईटी बॉम्बे में धरना, भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में प्रशासनिक भवन घेराव जैसे अनेक विरोध देशभर में जनवरी 2026 से तेज हो चुके हैं। अब तक लाखों छात्र सड़क पर आकर अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं, साफ समझ आ रहा है कि यह असंतोष ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ नियमों की एकतरफा भाषा और संरचना का परिणाम है।
जब विरोध तेज हुआ और राजनीतिक दबाव बढ़ा, तब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान मीडिया के सामने आए। 27 जनवरी को दिए बयान में उन्होंने कहा, किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव या उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा। न तो यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन, न केंद्र या राज्य सरकार किसी कानून का दुरुपयोग होने देगी। पूरी व्यवस्था संविधान के दायरे में रहेगी। सुनने में यह बयान संतुलित लगता है, लेकिन समस्या यह है कि यह उस नियम से मेल नहीं खाता जिसे लेकर पूरा विवाद खड़ा हुआ है। मंत्री का आश्वासन कागजी है क्योंकि नियम 3(सी) सामान्य वर्ग को असुरक्षित छोड़ देता है।
यूजीसी नियम: सतही समानता, गहरा पक्षपात
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों के तहत प्रत्येक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में समानता समिति और समानता दस्ता का गठन अनिवार्य है। 24×7 हेल्पलाइन और शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना होगा। जाति आधारित भेदभाव पर त्वरित कार्रवाई, उल्लंघन पर संस्थान की मान्यता रद्द या अनुदान रोकने की सजा- ये प्रावधान कागजों पर प्रभावी लगते हैं। किंतु वास्तविक विवाद नियम 3(सी) से उत्पन्न होता है। इसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित है।
यदि इन वर्गों का कोई छात्र सामान्य वर्ग के छात्र या शिक्षक पर आरोप लगाएगा तो शिकायत प्राइमा फेसी अपराध मानी जाएगी। 24 घंटे में जांच, तत्काल निलंबन संभव। लेकिन उल्टा होने पर सामान्य वर्ग का ब्राह्मण, क्षत्रीय, कायस्थ, वैश्य या अन्य छात्र जातिगत अपमान का शिकार होता है तो उसके लिए यहां कोई स्पष्ट संरक्षण प्रदान नहीं किया गया है।
तथ्य प्रमाण: यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन अधिसूचना (राजपत्र अधिसूचना 2026/एचई/12) के पृष्ठ 5 पर नियम 3(सी) स्पष्ट लिखा है- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग छात्रों के विरुद्ध भेदभाव में मौखिक अपमान, सामाजिक बहिष्कार शामिल…। सामान्य वर्ग का जिक्र शून्य। सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका (रिट याचिका (सिविल) 2026/45, अभिषेक सिंह बनाम यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) ने ठीक यही उद्धृत कर कहा कि यह अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन है। याचिका में मांग है कि परिभाषा सभी वर्गों के लिए हो।
इस व्यवस्था का सबसे खतरनाक परिणाम उच्च शिक्षा में ‘आरोप की संस्कृति’ को बढ़ावा मिलेगा। बिना ठोस प्रमाण सिर्फ शिकायत पर निलंबन। सामान्य वर्ग के लिए अपील तंत्र पूरी तरह कमजोर दिखता है या कहें, है ही नहीं तो कुछ गलत नहीं होगा । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो आंकड़े 2025 के अनुसार, परिसरों में जातिगत शिकायतों के मामलों में दुरुपयोग सिद्ध हुआ, जोकि सामान्य वर्ग के खिलाफ थे।
उदाहरण 1: आईआईटी कानपुर (2024)- अनुसूचित जाति छात्र ने ब्राह्मण पीएचडी छात्र पर ‘सवर्ण अहंकार’ का आरोप लगाया। बिना जांच निलंबन कर दिया गया; न्यायालय ने बाद में बरी किया, किंतु जब तक उस छात्र के दो साल बर्बाद हो चुके थे, मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक हानि के साथ पूरा परिवार दो वर्ष की न्याय की आस में न्यायालय, पुलिस प्रशासन और आईआईटी कानपुर के चक्कर लगाता रहा।
उदाहरण 2: जेएनयू (2022)- अन्य पिछड़ा वर्ग छात्र की सामान्य वर्ग प्रोफेसर पर शिकायत पर विभागीय जांच हुई लेकिन उल्टा केस खारिज, प्रोफेसर साहब की कोई गलती नहीं पाई गई।
उदाहरण 3: आईआईएम बैंगलोर (2023)- एससी छात्र ने जनरल कैटेगरी छात्र पर ‘जातिवादी’ होने का आरोप लगाया; ग्रुप प्रोजेक्ट से हटाया गया, बाद में कोर्ट में साबित हुआ कि लगाया गया आरोप झूठा है।
उदाहरण 4: एआईआईएमएस दिल्ली (2024)- एसटी छात्र की सामान्य वर्ग इंटर्न पर ‘भेदभाव’ शिकायत; होस्टल से निकाला, जांच हुई तो सामान्य वर्ग का छोत्र निर्दोष सिद्ध हुआ।
उदाहरण 5: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (2025)- सामान्य वर्ग छात्र शिवम सोनकर को आरक्षण सीट न देने के नाम पर एससी संगठनों ने घेरा; दाखिला रुका। भोपाल एमएएनआईटी (2025)- एसटी छात्र ने जनरल छात्र को धमकाया, कोई कार्रवाई नहीं हुई। रोहिणी हत्याकांड (केरल विश्वविद्यालय, 2024) याद करें- सामान्य वर्ग लड़की को अनुसूचित जाति छात्रों ने जाति आधारित प्रताड़ना दी, लेकिन सुरक्षा अभाव में न्याय न मिला।
इस प्रकार के अनेक प्रकरण हैं, जिनमें जो पीड़ित पक्ष था, वही जांच या न्यायालय से आरोपी सिद्ध हुआ, किंतु जब तक ये जांच चली सामान्य वर्ग के छात्र को चहुंओर से सिर्फ अपमान ही सहना पड़ा है। जो शिकायत कर्ता था अथवा जो पीड़ित था, पता चला कि उसके एससी-एसटी होने के कारण से उसके जूठे पाए जाने के बाद भी उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। क्या ये न्याय का मजाक नहीं है?
संविधान का अनुच्छेद 14 सभी को कानून के समक्ष समानता देता है। अनुच्छेद 15(1) सभी नागरिकों के लिए जाति आधारित भेदभाव निषिद्ध करता है। सर्वोच्च न्यायालय के इंदिरा साहनी फैसले (1992) ने आरक्षण को ‘सामाजिक न्याय’ कहा, लेकिन ‘रिवर्स भेदभाव’ की मनाही की। यह नियम उसी का उल्लंघन है। अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) सुरक्षित वातावरण भी सुनिश्चित करता है। किंतु यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन इसे यहां तोड़ रहा है।
शिक्षा परिसर विचार-विमर्श का स्थान होना चाहिए, न कि डर का। यह नियम छात्रों को जातियों में बांटेगा। यह सामाजिक तनाव बढ़ाएगा। वास्तव में धर्मेंद्र प्रधान का बयान तब तक अधूरा है जब तक नियम 3(सी) में सभी वर्गों को शामिल न किया जाए। सरकार को अधिसूचना वापस लेनी चाहिए या तटस्थ जांच तंत्र जोड़ना चाहिए। जूठी शिकायत पाए जाने पर कठोर दंड का प्रावधान करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी तो है, लेकिन स्थगन आदेश लगे बिना दुरुपयोग रुकेगा नहीं, यह तय है, इस बात को तो स्वयं धर्मेंद्र प्रधान को भी समझना चाहिए।
वैसे धर्मेंद्र प्रधान की पृष्ठभूमि छात्र नेता की रही है, वे लम्बे समय तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में कार्यरत रहे हैं, एक जिला इकाई से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर संगठन पदाधिकारी रहकर उन्होंने छात्रों की समस्याओं को नजदीक से जाना और उन समस्याओं के समाधान के लिए सतत संघर्ष किया है, इसलिए आज उनके न्याय की आस है। देखा जाए तो यह जो नियम आया है, इसकी कोई जरूरत नहीं थी, इसे आना ही नहीं चाहिए था, किंतु यदि सरकार को इतना ही जरूरी लगता है तो शिक्षा के स्तर पर जो समानता का नारा दिया जाता है, कम से कम इस नियम में उसी का पालन होता।
अंत में यही कि न्याय सबके लिए होना चाहिए। अन्यथा, उच्च शिक्षा का भविष्य खतरे में है। सरकार सच स्वीकारे कि उससे गलती हुई, अब इसमें सुधार जितना शीघ्र हो उतना जल्दी करे, अन्यथा देश भर में यूजीसी द्वारा अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ के विरोध में आंदोलन और तेज होंगे। जो कहीं से भी किसी के हित में नहीं हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
