– डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत की आरक्षण नीति, जो कभी सामाजिक न्याय का औज़ार थी, आज पहचान की राजनीति और योग्यता की बहस के बीच फँस चुकी है। सवर्ण युवाओं की जाति रहित दृष्टि को व्यवस्था लगातार नकारती रही है, जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए समता संवर्द्धन विनियम विश्वविद्यालय परिसरों में निगरानी का एक नया तंत्र खड़ा कर रहे हैं। न्याय के नाम पर राजनीति हावी है और शिक्षा उसका मैदान बन गई है।
आरक्षण की जड़ें स्वतंत्रता-पूर्व काल में हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलितों के ऐतिहासिक उत्पीड़न के प्रतिकार के लिए प्रतिनिधित्व की माँग उठाई। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण स्वीकार हुआ। 1950 के दशक में 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 7.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति तय हुआ। 1990 में मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत दिया। इंदिरा साहनी मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने 50 प्रतिशत की सीमा तय की- यह स्वीकारते हुए कि असीम आरक्षण, योग्यता और प्रतिस्पर्धा को क्षति पहुँचा सकता है।
समय के साथ बदलाव आए। 2019 के 103वें संविधान संशोधन से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण मिला-जाति से इतर आर्थिक आधार को संवैधानिक मान्यता मिली। पर अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में क्रीमी लेयर का सख़्त अनुपालन अब भी अधूरा है। नागराज मामले (2006) ने पदोन्नति में आरक्षण को वैध ठहराया, पर आँकड़ों के संग्रह को अनिवार्य किया-जो अक्सर औपचारिकता बनकर रह गया।
राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (2019-20) के अनुसार उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का नामांकन 50 प्रतिशत से ऊपर है, पर ड्रॉपआउट दर 20–25 प्रतिशत बनी हुई है। यह तथ्य तैयारी और प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में अंतर की ओर संकेत करता है, न कि केवल भेदभाव की ओर।
संयुक्त प्रवेश परीक्षा और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा में कोटा विवाद थमता नहीं। भारतीय अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र (2023) बताता है कि 70 प्रतिशत युवा जाति को अप्रासंगिक मानते हैं- खासकर सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्रों में। फिर भी प्रमाणपत्रों और अंकतालिकाओं पर जाति की मुहर चेतना पर बोझ बनती जा रही है। फौजी परिवारों तथा अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय शिक्षा वाले युवाओं के लिए जाति एक बंद फ़ाइल है- जिसे व्यवस्था बार-बार खोल देती है।
इससे एकीकरण नहीं, सामाजिक दूरी बढ़ने की आशंका है।
यह ढाँचा अमेरिकी विविधता, समता और समावेशन मॉडल से प्रेरित प्रतीत होता है, जबकि 2023 में संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च शिक्षा में नस्ल-आधारित सकारात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई। भारत जैसे जटिल सामाजिक ढाँचे में आयातित निगरानी उलटा असर डाल सकती है।
जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य कटऑफ से अधिक अंक लाता है, तो उसे योग्यता के आधार पर अनारक्षित सीट मिलेगी- आरक्षण का कोटा खाली नहीं छोड़ा जाएगा। यह इंदिरा साहनी की भावना के अनुरूप है कि आरक्षण प्रतिनिधित्व का साधन है, कोई रियायत नहीं। हालांकि, संकाय भर्ती और पदोन्नति पर इसका प्रभाव सीमित है; कुछ राज्यों में 65 प्रतिशत से अधिक आरक्षण अब भी न्यायिक समीक्षा में है।
आँकड़े मिश्रित तस्वीर दिखाते हैं। उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का नामांकन 50 प्रतिशत से अधिक है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में लगभग 49.5 प्रतिशत कोटा भरा है, जबकि निजी क्षेत्र में लगभग 90 प्रतिशत नियुक्तियाँ योग्यता आधारित हैं। बेरोज़गारी लगभग 23 प्रतिशत बनी हुई है। मूल समस्या जाति से अधिक शिक्षा की गुणवत्ता और पूर्व-तैयारी की कमी है।
हरियाणा की पंचायतों में 73वें संविधान संशोधन के तहत 50 प्रतिशत महिला आरक्षण ने राजनीतिक चेतना बढ़ाई। प्रॉक्सी सरपंच जैसी समस्याएँ रहीं, पर समय के साथ निर्णय क्षमता और भागीदारी बढ़ी। अहम यह कि वहाँ निगरानी-दस्ता नहीं था; स्वाभाविक एकीकरण हुआ।
यह दिखाता है कि आरक्षण सशक्तिकरण के लिए हो, स्थायी विभाजन के लिए नहीं।
समाधान स्पष्ट हैं- आर्थिक आधार को मज़बूत किया जाए, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के आरक्षण का लक्ष्यीकरण बेहतर हो; प्रत्येक जिले में निःशुल्क पूर्व तैयारी और कोचिंग केंद्र स्थापित हों; अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में क्रीमी लेयर का सख़्त पालन हो; विश्वविद्यालय परिसरों में निगरानी के बजाय सहयोगी कार्यशालाएँ हों; हर दस वर्ष में आँकड़ों के आधार पर कोटा की समीक्षा की जाए और स्कूल स्तर पर विज्ञान, गणित और भाषा की गुणवत्ता सुधारी जाए।
आज का युवा जाति से आगे देखता है- वह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और स्पेसएक्स से प्रेरित है। लेकिन नीतिगत अभ्यास उसे पहचान की राजनीति में उलझा रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की समता निगरानी दूरी बढ़ा सकती है। समय है कि योग्यता को प्राथमिकता दी जाए, न्याय को आर्थिक आधार दिया जाए और पंचायतों की तरह सशक्तिकरण बिना विभाजन का रास्ता चुना जाए। राष्ट्र पहले- जाति साधन हो, लक्ष्य नहीं।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
