धर्मशाला, 04 फ़रवरी (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के पंजाबी एवं डोगरी विभाग द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के तत्वावधान एवं सौजन्य से श्री गुरु तेग बहादुर जी : जीवन, वाणी और शहादत विषय पर आयोजित दो-दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का बुधवार को समापन हो गया। समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, उपाध्यक्ष, हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, पंचकूला मौजूद रहे।

उन्होंने कहा कि गुरु परंपरा को अलग-अलग खंडों में नहीं, बल्कि एक सतत विचारधारा के रूप में समझने की आवश्यकता है। श्री गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान और उनके सुपुत्र श्री गुरु गोबिंद सिंह द्वारा धर्म की रक्षा हेतु दिए गए आत्मबलिदान को मानव इतिहास की अमूल्य धरोहर बताया गया। उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ केवल संप्रदाय नहीं, बल्कि कर्तव्य है—चाहे वह माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति हो, डॉक्टर का मरीज के प्रति हो या राजा का प्रजा के प्रति। “जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।” राजधर्म का आशय सभी नागरिकों को अपने-अपने कर्तव्यों के पालन हेतु प्रेरित करना है, न कि किसी एक पूजा पद्धति को थोपना। वक्ता ने ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से बताया कि जब समाज संगठित होकर अपने कर्तव्य निभाता है, तभी राष्ट्र और संस्कृति सुरक्षित रहती है।

संगोष्ठी के तृतीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. जगबीर सिंह ने गुरु तेग बहादुर जी के जीवन-दर्शन, उनके नैतिक मूल्यों और मानवता के प्रति उनके दृष्टिकोण का विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने कहा कि इतिहास को भूलना अपनी जड़ों से कटने जैसा है। हमारी जड़ें ही हमें भविष्य की दिशा दिखाती हैं। गुरु तेग बहादुर जी को समझने के लिए हमें उनसे पहले के ऐतिहासिक संदर्भों और विशेष रूप से गुरु नानक देव जी के युग को समझना अनिवार्य है।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि गुरु परंपरा आज भी समाज को कर्तव्य, साहस और आत्मसंयम का मार्ग दिखाती है तथा वर्तमान चुनौतियों का समाधान इन्हीं मूल्यों में निहित है।
संगोष्ठी में देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधार्थियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।
इस संगोष्ठी में ऑनलाइन माध्यम से अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से विभिन्न विद्वानों ने हिस्सा लिया। ऑनलाइन सत्र के पहले चरण में 12 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्रों की प्रस्तुति दी। ऑनलाइन माध्यम के आख़िरी एवं तीसरे सत्र में लगभग 17 शोध पत्रों की प्रस्तुति दी गई।
हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया
