योगेश कुमार गोयल

हर साल 10 फरवरी को मनाया जाने वाला ‘विश्व दलहन दिवस’ हमें यह सोचने का अवसर देता है कि जिन दालों को हम रोजमर्रा के भोजन का साधारण हिस्सा मान लेते हैं, वे वास्तव में मानव सभ्यता और प्रकृति के बीच संतुलन की एक गहरी कड़ी हैं। खेतों से लेकर थाली तक की यह यात्रा केवल भोजन भर की नहीं है बल्कि इसमें पोषण, पर्यावरण, कृषि और भविष्य की खाद्य सुरक्षा के सूत्र छिपे हैं। वर्ष 2026 की आधिकारिक थीम ‘विश्व की दलहन: सादगी से उत्कृष्टता की ओर’ इसी सच्चाई को रेखांकित करती है कि छोटे से दिखने वाले बीज किस तरह वैश्विक समाधान बनकर उभर रहे हैं।

यह दिवस खाद्य एवं कृषि संगठन के नेतृत्व में विश्वभर में मनाया जाता है। दिसंबर 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस दिवस की घोषणा के बाद से 2019 से यह निरंतर मनाया जा रहा है। इसकी प्रेरणा 2016 में मनाए गए अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष से मिली थी, जिसने पहली बार वैश्विक मंच पर यह स्पष्ट किया कि दालें केवल पारंपरिक भोजन नहीं, पोषण सुरक्षा और टिकाऊ कृषि का प्रभावी साधन हैं। दलहन, यानी फलीदार पौधों से प्राप्त सूखे और खाने योग्य बीज, सदियों से मानव आहार का आधार रहे हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में ये भोजन की रीढ़ रहे जबकि आधुनिक समय तक कुछ क्षेत्रों में इन्हें साधारण या कम मूल्य वाला भोजन समझा गया लेकिन पोषण विज्ञान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।
आज यह स्वीकार किया जा चुका है कि दालें उच्च गुणवत्ता वाले पौध-आधारित प्रोटीन का उत्कृष्ट स्रोत हैं। इनके साथ मिलने वाला आहार फाइबर पाचन को बेहतर बनाता है, रक्त शर्करा को नियंत्रित करता है और हृदय रोगों के जोखिम को कम करता है। आयरन, जिंक, फोलेट, मैग्नीशियम और बी-विटामिन्स जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व इन्हें हर आयु वर्ग के लिए उपयोगी बनाते हैं। कम वसा और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स के कारण ये आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। पर्यावरण की दृष्टि से दालों का महत्व और भी व्यापक है। इनमें मिट्टी में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की प्राकृतिक क्षमता होती है, जिससे खेतों की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।
अन्य फसलों की तुलना में इन्हें कम पानी की जरूरत पड़ती है और इनका कार्बन फुट प्रिंट भी कम होता है। यही कारण है कि बदलते जलवायु परिदृश्य में दलहन को जलवायु-अनुकूल और भविष्य की फसल माना जा रहा है। सीमित संसाधनों और अनिश्चित मौसम के दौर में ये फसलें किसानों और पर्यावरण दोनों के लिए भरोसेमंद विकल्प बनती जा रही हैं। वैश्विक खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में भी दलहन की भूमिका निर्णायक है। तेजी से बढ़ती आबादी, कुपोषण और जलवायु अस्थिरता के बीच दालें सस्ती, सुलभ और पोषण से भरपूर समाधान प्रस्तुत करती हैं। भूख मुक्त समाज, बेहतर स्वास्थ्य और टिकाऊ विकास जैसे वैश्विक लक्ष्यों को हासिल करने में इनका योगदान प्रत्यक्ष और प्रभावी है।
भारत में विश्व दलहन दिवस का महत्व केवल एक वैश्विक तिथि तक सीमित नहीं रहता बल्कि यह देश की कृषि परंपरा, पोषण दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना से गहराई से जुड़ जाता है। भारत न केवल विश्व के प्रमुख दलहन उत्पादक और उपभोक्ताओं में अग्रणी है बल्कि यहां की खाद्य संस्कृति में दाल को संतुलित आहार की आत्मा माना गया है। दाल-चावल, दाल-रोटी और खिचड़ी जैसे सरल, सुलभ और पौष्टिक भोजन सदियों से भारतीय समाज में स्वास्थ्य, सादगी और सहजीवन के प्रतीक रहे हैं। दलहन केवल थाली की शोभा नहीं बल्कि पोषण सुरक्षा की मजबूत आधारशिला हैं। इनमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, फाइबर, खनिज और सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो कुपोषण से लड़ने और स्वास्थ्य सुधारने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। विशेषकर शाकाहारी आबादी के लिए दालें सस्ती, टिकाऊ और भरोसेमंद प्रोटीन स्रोत हैं।
कुल मिलाकर, यह दिवस किसानों के लिए भी नई संभावनाओं का द्वार खोलता है। दलहन आधारित फसल चक्र अपनाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, नाइट्रोजन स्थिरीकरण के कारण रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है और जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। परिणामस्वरूप किसानों की लागत कम होती है और आय में स्थिरता आती है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के दौर में दलहन खेती पर्यावरण के अनुकूल समाधान प्रस्तुत करती है। उपभोक्ताओं के लिए यह अवसर अपने भोजन विकल्पों पर पुनर्विचार करने का संदेश देता है, अधिक पौध आधारित, स्थानीय और पोषण-संपन्न आहार की ओर लौटने का आह्वान। दालें यह सिद्ध करती हैं कि सादगी में भी उत्कृष्टता छिपी होती है। यदि नीति-निर्माता, किसान और उपभोक्ता मिलकर दलहनों को प्राथमिकता दें तो स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था, तीनों को एक साथ मजबूती मिल सकती है। सच यही है कि छोटे-छोटे बीज मिलकर एक सुरक्षित, स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य की नींव रखते हैं।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद
