—इस वर्ष एक विशेष परिवर्तन,शिवार्चनम मंच पर अबीर-गुलाल नहीं खेलेंगे श्रद्धालु

वाराणसी, 25 फरवरी (हि.स.)। काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ के गौना उत्सव रंगभरी एकादशी के अवसर पर इस वर्ष श्री काशी विश्वनाथ धाम में श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए व्यापक स्तर पर व्यवस्थाओं को सुदृढ़ किया गया है। मंदिर प्रशासन ने आयोजन को सुव्यवस्थित और गरिमामय बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) डॉ. विश्वभूषण मिश्र ने बुधवार को बताया कि परंपरा के अनुसार बाबा की चल रजत प्रतिमा बाहर से शोभायात्रा के रूप में धाम परिसर लाई जाएगी। काशीवासियों को अपने आराध्य की प्रतिमा के साथ अबीर-गुलाल और रंगों की होली खेलने के लिए आमंत्रित किया गया है। हालांकि, धाम क्षेत्र की संकरी गलियों और संभावित भीड़ को देखते हुए पुलिस प्रशासन तथा महंत परिवार के साथ बैठक के बाद यह निर्णय लिया गया है कि प्रतिमा के साथ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अधिकतम 64 तक सीमित रहेगी। इससे अनावश्यक भीड़ पर नियंत्रण रहेगा और सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ बनी रहेगी। सीईओ के अनुसार लोकाचार और सांस्कृतिक शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप चल प्रतिमा को गर्भगृह में विराजमान कराया जाएगा, जहां सप्तऋषि आरती सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठान विधिपूर्वक संपन्न होंगे।
—शिवार्चनम मंच पर ‘फूलों की होली’ का विशेष आयोजन
इस वर्ष एक विशेष परिवर्तन करते हुए शिवार्चनम मंच पर आयोजित कार्यक्रमों के दौरान श्रद्धालु परस्पर अबीर-गुलाल नहीं खेलेंगे, अपितु वहाँ ‘फूलों की होली’ की व्यवस्था की गई है। मंच पर केवल ‘फूलों की होली’ आयोजित की जाएगी, जिससे सांस्कृतिक गरिमा और स्वच्छता दोनों बनी रहे। कार्यक्रम का समापन ब्रज के रसिकों की मंडली द्वारा प्रस्तुत ‘फूलों की होली’ से होगा। यह प्रस्तुति काशी और ब्रज की सांस्कृतिक एकात्मता का प्रतीक मानी जा रही है। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं से शालीन वेशभूषा में उपस्थित होने और रात्रि 10 बजे तक चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अनुशासित भाव से आनंद लेने की अपील की है। काशी, जो अपनी ज्ञान परंपरा, विद्वानों और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है, वहां आयोजित यह पर्व श्रद्धा, शालीनता और सांस्कृतिक समन्वय का अनुपम उदाहरण बने—इसी अपेक्षा के साथ प्रशासन ने सभी भक्तों से सहयोग की अपील की है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी
