ताज महोत्सव (18 से 27 फरवरी) पर विशेष

– योगेश कुमार गोयल

यमुना के पावन तट पर स्थित धवल संगमरमर की वह अलौकिक कृति, जिसे दुनिया ताजमहल के नाम से जानती है, केवल ईंट-पत्थरों और नक्काशी का मेल नहीं है बल्कि भारतीय संवेदनाओं, स्थापत्य-कौशल और सौंदर्य-चेतना का एक शाश्वत महाकाव्य है। जब इस विश्वप्रसिद्ध स्मारक की शीतल और भव्य छाया में रंगों की चटक आभा, रागों की मधुर लहरियां और रसों की सजीव अनुभूति एक साथ साकार होती है, तब वह दृश्य ‘ताज महोत्सव’ के रूप में भारतीय संस्कृति का एक अनुपम उत्सव बन जाता है।
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर आगरा में 18 से 27 फरवरी तक आयोजित हो रहा यह दस दिवसीय सांस्कृतिक पर्व केवल एक साधारण मेले का विस्तार नहीं है बल्कि यह भारत की बहुरंगी परंपराओं, लोक-स्मृतियों, लुप्तप्राय शिल्प-कौशल और उस विराट पाक-वैभव का उत्सव है, जहां राष्ट्र की विविधता वैश्विक मंच पर एक साथ स्पंदित होती हैं। इस वर्ष अपने 34वें गौरवशाली संस्करण में प्रवेश कर रहे इस महोत्सव की थीम ‘वंदे मातरम: परंपरा एवं राष्ट्र गौरव’ हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना का एक सशक्त उद्घोष है, जो आगंतुकों के भीतर स्वदेश प्रेम और अपनी जड़ों के प्रति सम्मान की भावना को प्रगाढ़ करता है।
सन् 1992 के वसंत में जब इस महोत्सव का बीजारोपण हुआ था, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह आयोजन आने वाले समय में भारत के सबसे प्रतिष्ठित और प्रतीक्षित सांस्कृतिक आयोजनों में शुमार हो जाएगा। इसका मूल दर्शन भारतीय हस्तशिल्प, लुप्त होती लोक कलाओं और सदियों पुराने पारंपरिक कौशलों को एक ऐसा मंच प्रदान करना रहा है, जहां वे अपनी आधुनिक प्रासंगिकता सिद्ध कर सकें। ताजमहल की जादुई पृष्ठभूमि में सजे सैंकड़ों स्टॉल, चटख और पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित लोक कलाकार, शास्त्रीय संगीत की गंभीर तान और लोकनृत्यों की लयात्मक थिरकन मिलकर एक ऐसा जादुई वातावरण रचते हैं, मानो पूरा लघु भारत एक ही परिसर में सिमट आया हो।
ताज महोत्सव की सबसे बड़ी पूंजी इसकी वह विविधता ही है, जो उत्तर के हिमालयी अंचल से लेकर दक्षिण के कन्याकुमारी तक और सुदूर पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से लेकर पश्चिम के रेगिस्तानों तक की कला को एक सूत्र में पिरोती है। यहां कश्मीर की पश्मीना शॉल की मखमली कोमलता और वाराणसी की रेशमी साड़ियों की राजसी चमक एक साथ देखी जा सकती है। लखनऊ की बारीक चिकनकारी की नजाकत हो या सहारनपुर की लकड़ी पर की गई सूक्ष्म नक्काशी, मुरादाबाद के पीतल शिल्प की सुनहरी दमक हो या खुर्जा की सिरेमिक कला की चटक रंगीन छटा, ये सभी तत्व मिलकर भारत की हस्तकला परंपरा का एक ऐसा जीवंत संग्रहालय रच देते हैं, जिसे देख दुनिया दांतों तले उंगली दबा लेती है। भदोही के हस्तनिर्मित कालीनों की जटिल बुनावट, दक्षिण भारत की पाषाण और काष्ठ मूर्तियां, पूर्वोत्तर के बांस-बेंत की कलाकृतियां और गुजरात के पटोला व बांधनी कार्य की विविधता दर्शकों को एक अनूठी सांस्कृतिक यात्रा पर ले जाती है।
यह महोत्सव केवल वस्तुओं के क्रय-विक्रय का बाजार नहीं है, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ की धड़कन और स्थानीय प्रतिभा के स्वाभिमान का एक जीवंत दस्तावेज है। इस वर्ष सरकार की ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ पहल के अंतर्गत प्रदेश के 50 जनपदों की विशिष्ट पहचान को जिस प्रकार एक ही मंच पर प्रतिष्ठित किया गया है, वह अद्भुत है। लगभग 500 सुसज्जित स्टॉल भारतीय उद्यमिता की उस रचनात्मक ऊर्जा का परिचय दे रहे हैं, जो परंपरा और आधुनिकता के सूक्ष्म समन्वय से नए भारत के भविष्य का निर्माण कर रही है। यहां प्रदर्शित खादी की सादगी, जूट की पर्यावरण-मित्र आत्मा और हथकरघा की सूक्ष्म बुनावट केवल व्यापारिक उत्पाद नहीं बल्कि स्वदेशी स्वाभिमान, सतत विकास और सांस्कृतिक निरंतरता के उन सशक्त प्रतीकों के रूप में उभरते हैं, जो वैश्विक बाजार में भारत की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं।
कला और शिल्प के इस महाकुंभ में संगीत और नृत्य की धाराएं आत्मा के स्पंदन की भांति प्रवाहित होती हैं। ताजमहल की मुगलई वास्तुकला की छाया में गूंजते शास्त्रीय, अर्ध-शास्त्रीय और लोक राग एक ऐसे सांगीतिक वातावरण का सृजन करते हैं, जो श्रोताओं को अलौकिक आनंद की अनुभूति कराता है। ब्रज के उल्लासपूर्ण लोकनृत्य, जिनमें होली की मस्ती और राधा-कृष्ण के प्रेम की महक होती है, कथक की भावप्रवण मुद्राएं, जिनमें इतिहास बोलता है और सूफी गायकी की वह रूहानी लहरियां, जो सीधे खुदा से संवाद करती प्रतीत होती हैं, दर्शकों को एक आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती हैं।
इस वर्ष के विशाल डिजिटल मुक्ताकाशीय मंच पर आधुनिकता का भी समावेश है, जहां नीरज श्रीधर की ऊर्जस्वित बॉलीवुड नाइट्स, कृष्णा-अभिषेक की हास्य-विनोद से भरपूर प्रस्तुतियां और सचिन-जिगर की सुरीली धुनों वाली समापन संध्या युवा ऊर्जा को एक नई चमक प्रदान करेगी। इसके साथ ही ‘इंडियन ओशन’ जैसे बैंड की फ्यूजन संगीत, अली ब्रदर्स की शुद्ध सूफियाना सुर-लहरियां और माधवाज बैंड की भक्तिमय संध्या इस महोत्सव को संगीत-प्रेमियों के लिए एक कभी न भूलने वाला अनुभव बना देने वाली हैं।
भारतीय उत्सव की आत्मा उसके स्वाद में बसती है और ताज महोत्सव इस मामले में किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यहां देशभर के उन पारंपरिक व्यंजनों का संसार सजता है, जो जीभ के स्वाद के साथ-साथ हमारी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का भी परिचय देते हैं। उत्तर प्रदेश के चटपटे आंचलिक व्यंजनों से लेकर दक्षिण भारत के कुरकुरे डोसे, राजस्थानी दाल-बाटी-चूरमा की सोंधी खुशबू, पंजाब की मलाईदार लस्सी, बंगाल की रसभरी मिठाइयां और कश्मीर के शाही वाजवान तक, हर स्वाद अपनी विशिष्ट पहचान के साथ यहां उपस्थित होता है। यह भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक समृद्धि का सजीव प्रमाण है, जो सदियों के मेलजोल से विकसित हुई है।
इसके साथ ही, यह आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आगरा के होटल, रेस्तरां, परिवहन सेवाएं, हस्तशिल्प बाजार और टूर गाइडों के चेहरों पर इस दौरान जो रौनक दिखाई देती है, वह पर्यटन उद्योग की गतिशीलता का प्रतीक है। हजारों की संख्या में आने वाले विदेशी पर्यटक जब भारतीय परिधानों को पहनकर, यहां की हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाओं के बीच समय बिताते हैं तो वे अपने साथ भारत की एक सुखद और गौरवशाली छवि लेकर स्वदेश लौटते हैं।
आगरा स्वयं भी इतिहास और स्थापत्य का एक अनूठा संगम है। महाभारत काल में ‘अग्रवन’ के रूप में वर्णित यह नगर, जिसे कभी सिकंदर लोदी ने बसाया और बाद में मुगल सम्राटों अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां ने अपनी राजधानी बनाकर विश्वपटल पर चमक दी, आज भी अपनी ऐतिहासिकता को संजोए हुए है। इसी गौरवशाली अतीत की पृष्ठभूमि के कारण ताज महोत्सव का महत्व और भी गहन हो जाता है। प्रेम, कला और इतिहास के इस त्रिवेणी संगम में जब आधुनिक मंच-सज्जा, डिजिटल तकनीक और लेजर शो का समावेश होता है, तब परंपरा और आधुनिकता का वह अद्भुत सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है, जिसे दुनिया आज का भारत कहती है। महोत्सव में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन, मुशायरे और गजल संध्याएं साहित्यिक रसिकों के लिए एक ऐसा आकर्षण केंद्र होती हैं, जहां शब्दों की सरगम और भावों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति दर्शकों को हमारी महान साहित्यिक विरासत से जोड़ती है। चित्रकला, फोटोग्राफी और नृत्य प्रतियोगिताएं आयोजित कर यह महोत्सव न केवल स्थापित दिग्गजों को मंच देता है बल्कि नवोदित प्रतिभाओं के सपनों को भी नई उड़ान देता है।
ताज महोत्सव की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि यह है कि यह अमूर्त भारतीयता की भावना को एक मूर्त उत्सव में रूपांतरित कर देता है। यहां रखा हस्तशिल्प का हर एक नमूना अपनी मिट्टी की कहानी कहता है, कलाकारों की हर प्रस्तुति एक प्राचीन धरोहर को पुनर्जीवित करती है और हर व्यंजन एक क्षेत्रीय पहचान को सहेजता है। यह आयोजन इस महान सत्य का जयघोष है कि भारत केवल विविधताओं का देश नहीं है बल्कि उन तमाम भिन्नताओं को एक ही सूत्र में पिरोने की एक अद्भुत और अदम्य क्षमता रखने वाला राष्ट्र है। जब ताजमहल की श्वेत आभा सूर्यास्त की सुनहरी किरणों में घुलती है और पृष्ठभूमि में किसी शास्त्रीय राग की अंतिम तान गूंजती है, तब ताज महोत्सव केवल एक दस दिवसीय कार्यक्रम मात्र नहीं रह जाता बल्कि भारतीय संस्कृति का एक ऐसा जीवंत और प्राणवान उत्सव बन जाता है, जहां इतिहास वर्तमान से संवाद करता है और परंपराएं आधुनिकता का हाथ थामकर भविष्य की सुनहरी राह पर चल पड़ती हैं।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैंं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
