देहरादून, 10 मार्च (हि.स.)। गंगा की स्वच्छता और संरक्षण के लिए केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे के तहत उत्तराखंड में संचालित परियोजनाओं को लेकर महा लेखापरीक्षाक में कई गंभीर कमियां सामने आई हैं। हालांकि राज्य सरकार ने इन कमियों को स्वीकार करते हुए सुधारात्मक कदम उठाने की बात कही है, जिससे भविष्य में गंगा जल की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। खुलासा हुआ है कि राज्य में संचालित 44 एसटीपी में से आठ एसटीपी मई 2024 तक चार वर्षों से अधिक समय से उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से समेकित सहमति एवं प्राधिकार (सीसीए) का नवीनीकरण कराए बिना संचालित हो रहे थे। यह विभिन्न पर्यावरणीय प्रावधानों का उल्लंघन माना गया है।

ऋषिकेश स्थित 3.0 एमएलडी स्वर्गाश्रम और 3.5 एमएलडी तपोवन एसटीपी में संग्रह टैंक से बिना शोधन के सीवेज सीधे गंगा में प्रवाहित किए जाने का मामला भी सामने आया। यह कृत्य जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 24 का उल्लंघन है। संबंधित ठेकेदार ने उपकरणों के पुराने एवं दोषपूर्ण होने की बात कहते हुए अपनी गलती स्वीकार की, किंतु विभाग द्वारा अब तक किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। पेयजल सचिव ने बहिर्गमन गोष्ठी में आश्वासन दिया कि जिम्मेदारी तय की जाएगी।
इसके अतिरिक्त, हरिद्वार में 18 सीवरेज पंपिंग स्टेशनों की रियल टाइम निगरानी के लिए स्थापित मास्टर कंट्रोल स्टेशन जनवरी 2022 से संचालित नहीं पाया गया। राज्य सरकार ने इसे जनशक्ति एवं तकनीकी विशेषज्ञों की कमी से जोड़ते हुए बताया कि अब प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती कर एमसीएस को पुनः संचालित कर दिया गया है और सभी पंपिंग स्टेशनों की निगरानी शुरू हो चुकी है।
गंगा जल गुणवत्ता अनुश्रवण में भी मिश्रित परिणाम सामने आए हैं। देवप्रयाग तक जल गुणवत्ता ‘ए’ श्रेणी में रही, जबकि ऋषिकेश और हरिद्वार में अधिकांश अवधि में ‘बी’ श्रेणी दर्ज की गई। कार्यक्रम का क्रियान्वयन राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत किया जा रहा है। वर्ष 2014-23 के दौरान केंद्र सरकार ने गंगा संरक्षण परियोजनाओं के लिए 14,260 करोड़ जारी किए, जिनमें से 1,149 करोड़ उत्तराखंड को प्राप्त हुए। कई कमियां उजागर हुई हैं, लेकिन राज्य सरकार ने सुधारात्मक कदम उठाने का भरोसा दिलाया है।
सात गंगा तटवर्ती नगरों में सीवेज संयोजन का संकट, करोड़ों खर्च के बावजूद घरों से नहीं जुड़े एसटीपी
गंगा तटवर्ती नगरों में सीवेज प्रबंधन की योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद अधिकांश सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) घरों से नहीं जुड़े हैं। परिणामस्वरूप ये एसटीपी केवल नालों से आने वाले धूसर पानी का ही शोधन कर रहे हैं, जबकि घरेलू सीवर सीधे गंगा और उसकी सहायक धाराओं में जा रहा है।
ऑडिट संदर्भ के अनुसार सात गंगा तटवर्ती नगरों में एसटीपी और सीवर नेटवर्क के बीच समन्वय का अभाव पाया गया। जोशीमठ में 02 एसटीपी (3.78 एमएलडी), नंदप्रयाग में 02 एसटीपी (0.15 एमएलडी), कर्णप्रयाग में 05 एसटीपी (0.35 एमएलडी) तथा रुद्रप्रयाग में 06 एसटीपी (0.525 एमएलडी) घरों से नहीं जुड़े हैं।
विवरण के अनुसार, एक परियोजना में बिना किसी एसटीपी को शामिल किए ₹9.61 करोड़ की लागत से केवल इंटरसेप्शन एवं डायवर्जन (आई एंड डी) कार्य स्वीकृत किया गया था। मार्च 2010 में स्वीकृत यह कार्य ₹9.57 करोड़ खर्च होने के बाद मार्च 2017 में बंद कर दिया गया। इसके बाद मार्च 2017 में एसटीपी सहित नई आई एंड डी परियोजना 48.43 करोड़ (अगस्त 2021 में संशोधित होकर 62.40 करोड़) की लागत से स्वीकृत की गई, जिसका निर्माण 2022 में पूरा हुआ। लेकिन सीवर नेटवर्क के अभाव में किसी भी एसटीपी से घरेलू कनेक्शन नहीं जोड़े जा सके।
इसी प्रकार 6.46 करोड़ (संशोधित 6.51 करोड़) की लागत से स्वीकृत परियोजना में भी सीवर नेटवर्क न होने के कारण दोनों एसटीपी केवल तीन नालों से आने वाले धूसर पानी का ही उपचार कर रहे हैं। एक अन्य परियोजना में 1.40 एमएलडी क्षमता के एसटीपी सहित 8.81 करोड़ की लागत स्वीकृत हुई थी, परंतु केवल 0.95 करोड़ का आंशिक आई एंड डी कार्य होने के बाद दोनों परियोजनाएं बंद कर दी गईं।
इसके अतिरिक्त 12.09 करोड़ (संशोधित 12.01 करोड़) की लागत से स्वीकृत पांच एसटीपी वाली परियोजना में भी घरेलू कनेक्शन उपलब्ध नहीं हैं और ये सात नालों से आने वाले धूसर पानी का ही शोधन कर रहे हैं। वहीं सितंबर 2009 में स्वीकृत 12.62 करोड़ (आई एंड डी ₹7.92 करोड़, एसटीपी 4.70 करोड़) की परियोजना में केवल 0.71 करोड़ का आंशिक कार्य हुआ और एसटीपी का निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हो सका।
स्थिति यह दर्शाती है कि योजनाओं के निर्माण और स्वीकृति के बावजूद सीवर नेटवर्क विकसित न होने से एसटीपी की उपयोगिता सीमित रह गई है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी गंगा तटवर्ती नगरों में घरेलू सीवेज शोधन की मूल समस्या जस की तस बनी हुई है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय
