रांची, 10 मार्च (हि.स.)। झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दसवें दिन मंगलवार को श्रम, नियोजन, प्रशिक्षण और उद्योग विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान विधायकों ने कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। इस दौरान विधायक जयराम महतो और आलोक कुमार चौरसिया ने राज्य में बेरोजगारी, प्रवासी मजदूरों की स्थिति और रोजगार नीतियों को लेकर सरकार को घेरा।

डुमरी विधायक जयराम महतो ने खराब सेहत के बावजूद सदन में उपस्थित होकर झारखंड के श्रमिकों, नियोजन नीति और स्थानीय युवाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि वह बीमार होने के बावजूद दवा लेकर सदन में आए हैं। साथ ही विधानसभा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए सुझाव दिया कि विधायकों को प्रश्न रात एक-दो बजे के बजाय अधिकतम रात 11 बजे तक उपलब्ध करा दिए जाएं, ताकि वे बेहतर तैयारी कर सकें।
महतो ने कहा कि झारखंड के निर्माण में श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन उनके लिए ठोस योजनाएं नहीं बनाई गई हैं। उन्होंने दिहाड़ी मजदूरों, रेहड़ी-पटरी कारोबारियों और टेंपो चालकों के लिए यूनिक वर्कर आईडी प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया, जिससे उन्हें बीमा, ईएसआई और पीएफ जैसी सुविधाएं मिल सकें।
प्रवासी मजदूरों के आंकड़ों को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाया। महतो ने कहा कि कोरोना काल में लगभग 12 लाख मजदूर झारखंड लौटे थे, जबकि विभाग के पास इससे कम आंकड़े दर्ज हैं। उनके अनुसार राज्य से बाहर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या 16 लाख से भी अधिक हो सकती है।
वहीं डाल्टनगंज विधायक आलोक कुमार चौरसिया ने श्रम, कौशल विकास और उद्योग विभाग के कटौती प्रस्ताव के पक्ष में बोलते हुए राज्य सरकार की नीतियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार युवाओं को रोजगार देने में विफल रही है और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है।
चौरसिया ने कहा कि जिस श्रम विभाग की जिम्मेदारी रोजगार उपलब्ध कराना है, उसी विभाग की स्थिति संतोषजनक नहीं है। उन्होंने सरकार की ओर से पेश किए गए 1168.73 करोड़ रुपये के बजट पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसका लाभ युवाओं को जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है।
विधायक चौरसिया ने आरोप लगाया कि ठोस रोजगार नीति के अभाव में झारखंड के युवा दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। पलामू और गढ़वा जैसे क्षेत्रों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां बेरोजगारी चरम पर है और कई मजदूरों की मौत के बाद उनके शव दूसरे राज्यों से वापस आते हैं, जो सरकार की विफलता को दर्शाता है।
चौरसिया ने सुझाव दिया कि पलामू क्षेत्र की बंद पड़ी खदानों को फिर से शुरू किया जाना चाहिए। उन्होंने सोकरा माइंस, कैमरा माइंस और तलतवा माइंस का उदाहरण देते हुए कहा कि इन खदानों को चालू करने से स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल सकता है। उन्होंने कौशल विकास योजनाओं और आईटीआई संस्थानों की स्थिति पर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि कई आईटीआई संस्थानों की हालत खराब है और छात्र विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं।
उद्योग विभाग के बजट पर चर्चा करते हुए उन्होंने 571.30 करोड़ रुपये के प्रावधान को अपर्याप्त बताया। उन्होंने कहा कि सरकार इज ऑफ डूइंग बिजनेस की बात तो करती है, लेकिन वास्तविकता में उद्यमियों को भ्रष्टाचार, धमकियों और अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
चौरसिया ने सरकार पर चुनावी वादे पूरे नहीं करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि हर साल लाखों नौकरियां देने और बेरोजगारी भत्ता देने का वादा किया गया था, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी नियुक्तियां शुरू नहीं हो सकीं। इसके अलावा उन्होंने गर्मी को देखते हुए पेयजल व्यवस्था पर भी चिंता जताई और कहा कि कई जगह चापाकल और नल-कूप खराब पड़े हैं, लेकिन उन्हें ठीक कराने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही उन्होंने सड़कों की जर्जर स्थिति और विधायकों की अनुशंसित योजनाओं के धरातल पर नहीं उतरने का मुद्दा भी उठाया।
अंत में उन्होंने सरकार पर भ्रष्टाचार और लूट का आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य के विकास के लिए स्पष्ट विजन की आवश्यकता है। उन्होंने पलामू और गढ़वा जैसे जिलों में रोजगार और पेयजल व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने की मांग की।
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हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे
