डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

अभी मेडिकल पीजी में शून्य (0) पर्सेंटाइल पर प्रवेश का मुद्दा पुराना भी नहीं हुआ है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा स्कूल लेक्चरर के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम ने देश की शिक्षा के हालातों के पोल खोलकर ही रख दी है। शिक्षा के मंदिर में बच्चों को पढ़ाने के लिए लेक्चरर के पद पर नियुक्ति के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा में राजनीति विज्ञान के लेक्चरर के पद के लिए हजारों युवाओं ने परीक्षा दी और 225 पद होने के बावजूद केवल छह परीक्षार्थी चयन के योग्य पाये गये। मजे की बात है कि परीक्षा देने वाले हजारों युवाओं में मात्र 219 युवा भी न्यूनतम प्राप्तांक 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पाए। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि फिजिकल एजुकेशन के 37 पदों के लिए एक भी नहीं और होम साइंस जैसे विषय के लेक्चरर के पद के लिए केवल एक परीक्षार्थी ही सफल हो सका। अब एक ओर देश में प्रतिपक्ष बेरोजगारी की समस्या को गंभीरता से उठा रहा है तो तो दूसरी और भर्ती वाले पदों के लिए न्यूनतम अहर्ता अंक प्राप्त करने में भी आज के युवा सफल नहीं हो पा रहे हैं।
यह कोई राजस्थान की ही बात नहीं है अपितु यह समूचे देश की शिक्षा के स्तर की बानगी है। क्योंकि निश्चित रुप से राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अन्य प्रदेशों के युवा भी परीक्षार्थी रहे होंगे। बेरोजगारी की समस्या अपनी जगह पर है पर दूसरी ओर स्नातक, स्नातकोत्तर और तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के ज्ञान के स्तर को इससे आंका जा सकता है। यही कारण है कि आज मल्टी टास्क सर्विस जिसे परंपरागत शब्दों में कहा जाए तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद या शहरी निकायों में सफाई कर्मचारी के कुछ पदों के लिए ही हजारों लाखों युवा आवेदन करने लगे हैं और तस्वीर का एक पहलू यह है कि इन युवाओं में उच्च और तकनीकी शिक्षा यहां तक की इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए तक आवेदन कर रहे हैं।
यह हमारे शैक्षणिक संस्थानों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं होना चाहिए। राजनीतिक विज्ञान के स्कूल लेक्चरर के लिए परीक्षा देने वाले युवाओं ने निश्चित रूप से राजनीति विज्ञान की उच्च पढ़ाई की होगी। उनका न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं करना चिंताजनक है। वैसे देखा जाए तो 40 प्रतिशत अंक प्राप्त कर चयनित होने वाले स्कूल लेक्चरर से आप बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की अपेक्षा करेंगे तो बेमानी होगी। हालात वास्तव में गंभीर है और यही कारण है कि नौकरी के लिए आयोजित परीक्षाओं में नकल, गलत प्रयोग और पेपर आउट व डमी कैंडिडेट द्वारा परीक्षाएं देने के लिए माफिया की बन पड़ी है।
मेडिकल पीजी में जीरो पर्सेंटाइल पर प्रवेश के निर्णय पर यह अवश्य संतोष की बात है कि फैडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने सरकार के इस निर्णय की खिलाफत करने की हिम्मत दिखाई है। इसमें कोई दोराय नहीं कि देश में शिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा कर सबके लिए शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो सकी। अब तो डीम्ड यूनिवर्सिटी सहित यूनिवर्सिटी नित नई खुलती जा रही है। इसे अच्छा भी माना जा सकता है पर सौ टके का सवाल यह है कि क्या शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने के माध्यम ही बन कर रह गए हैं। राजनीति विज्ञान तो उदाहरण मात्र है, सवाल यह है कि परीक्षा देने वाले हजारों प्रतियोगियों ने किसी एक संस्थान से तो डिग्री प्राप्त की नहीं होगी। यह सोचने का वक्त है कि आखिर हम जा कहां रहे हैं।
शिक्षण संस्थानों की स्तरीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके अलावा जिस तरह से कोचिंग संस्थानों और पुस्तकालयों की बाढ़ आई हुई है उसके परिणाम भी इन परिणामों में कहीं दूर-दूर तक लक्षित नहीं हो रहे। सरकार और तकनीकी शिक्षण संस्थानों को कम से कम अपने स्तर का तो ध्यान रखना ही होगा। शिक्षा की गुणवत्ता और तकनीकी अध्ययन की वैश्विक पहचान बनाना सरकार और अध्ययन केन्द्रों की पहली और अंतिम प्राथमिकता होनी चाहिए, पर यहां तो स्थानीय स्तर पर ही खरे नहीं उतर पा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि जीरो पर्सेंटाइल वालों को विशेषज्ञ बनाकर इलाज का लाइसेंस देंगे तो इसे आम नागरिकों की जिंदगी से खिलवाड़ और शिक्षा पद्धति के साथ मजाक बनाना ही है। सरकार और आयोग को समय रहते शिक्षा के स्तर को बनाए रखने की पहल करनी होगी। इसी से देश की शिक्षा की गुणवत्ता देश दुनिया में बनी रह सकेगी। सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को खासतौर से आगे आना होगा।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद
