——तीन पीढ़िया संगीत जगत से,चार वर्ष में ही वायलिन बजाना शुरू किया

वाराणसी, 25 जनवरी (हि.स.)। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की पूर्व प्रोफेसर एवं विश्वविख्यात भारतीय शास्त्रीय वायलिन वादक डॉ. एन. राजम को देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की है। इस प्रतिष्ठित सम्मान की घोषणा से बीएचयू, संगीत जगत और सांस्कृतिक क्षेत्र में हर्ष और गौरव का वातावरण है। बीएचयू के परफॉर्मिंग आर्ट्स संकाय की पूर्व प्रमुख रहीं डॉ. एन. राजम हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अग्रणी हस्तियों में शुमार हैं। मूल रूप से चेन्नई निवासी डॉ. राजम का जन्म 8 अप्रैल 1938 को एक प्रतिष्ठित संगीत परिवार में हुआ। उनके पिता ए. नारायण अय्यर कर्नाटक संगीत के प्रख्यात विद्वान थे, जबकि उनके भाई टी.एन. कृष्णन कर्नाटक शैली के विश्वविख्यात वायलिन वादक रहे हैं।
डॉ. राजम ने अपने पिता के मार्गदर्शन में कर्नाटक संगीत की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में वायलिन के लिए विशिष्ट ‘गायकी अंग’ का विकास किया। उन्होंने इस शैली को देश-विदेश में मंचों पर प्रतिष्ठित पहचान दिलाई। उनका मानना है कि शब्द और स्वर एक-दूसरे के पूरक हैं, और शब्दों के बिना सुरों में भाव की पूर्ण अभिव्यक्ति संभव नहीं।
चार वर्ष की अल्पायु में वायलिन वादन आरंभ करने वाली डॉ. राजम नौ वर्ष की उम्र तक एक पेशेवर कलाकार के रूप में स्थापित हो चुकी थीं। उन्होंने यूरोप के कई देशों के अलावा अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, रूस और नीदरलैंड सहित अनेक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है।
डॉ. राजम को वर्ष 2012 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से सम्मानित किया जा चुका है। इससे पूर्व भारत सरकार उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मानों से भी अलंकृत कर चुकी है। संगीत की परंपरा उनके परिवार की तीन पीढ़ियों में निरंतर जीवंत रही है। उनकी पुत्री संगीता शंकर, पौत्रियां रागिनी शंकर और नंदिनी शंकर, तथा भतीजी कला रामनाथ सभी संगीत जगत में सक्रिय हैं। संगीता शंकर वायलिन वादन के साथ-साथ भजन प्रस्तुति के लिए भी जानी जाती हैं। डॉ. एन. राजम को पद्म विभूषण से सम्मानित किए जाने की घोषणा के बाद बीएचयू परिसर में हर्षोल्लास का माहौल है और संगीत प्रेमियों ने इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए गौरवपूर्ण क्षण बताया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी
