—लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से गंभीर बीमारियों का खतरा,माइक्रोप्लास्टिक पानी, मिट्टी और हवा—तीनों में फैला

वाराणसी, 09 फरवरी (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बावजूद इसका खुलेआम उपयोग जारी है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम अब माइक्रोप्लास्टिक के रूप में सामने आ रहा है, जो न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

आधुनिक जीवनशैली में प्लास्टिक की बढ़ती निर्भरता और इसके अनुचित निपटान ने इस अदृश्य खतरे को और गहरा कर दिया है। प्लास्टिक अपनी सस्ती कीमत और सुविधा के कारण दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन अधिकांश प्लास्टिक जैव-अपघटनीय नहीं होता। समय के साथ यह टूटकर 5 मिलीमीटर से भी छोटे कणों में बदल जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। ये कण पन्नी, पैकेजिंग सामग्री, बोतलें, कपड़े, टायर और अन्य प्लास्टिक उत्पादों के क्षरण से उत्पन्न होते हैं। पहले सौंदर्य प्रसाधनों में उपयोग होने वाले माइक्रोबीड्स भी माइक्रोप्लास्टिक का एक स्रोत रहे हैं। यह तथ्य काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान, आयुर्वेद संकाय के रस शास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विभाग में किए गए एक शोध में सामने आए हैं। “उत्तरी भारत में आयुर्वेद स्वास्थ्य एवं वेलनेस पर्यटन की व्यावहारिक संभावनाओं का व्यापक अध्ययन” विषय पर शोध कर रहीं छात्रा अंजू जांगिड़ ने प्रोफेसर आनन्द चौधरी के निर्देशन में यह अध्ययन किया है।
—पानी, मिट्टी और हवा—तीनों में फैल चुका माइक्रोप्लास्टिक
शोध के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक अब पानी, मिट्टी और हवा—तीनों माध्यमों में फैल चुका है। अनुमान है कि वर्ष 2020 तक लगभग 27 लाख टन माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण में पहुंच चुका था, और आने वाले वर्षों में इसमें और वृद्धि की आशंका है। चिंता का विषय यह है कि ये कण भोजन और पेयजल के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं।
भारत सरकार द्वारा एकल-उपयोग प्लास्टिक को समाप्त करने के लिए प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम, 2021 लागू किए गए हैं। उत्तर प्रदेश भी पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने वाले राज्यों में शामिल है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन नियमों का पालन पूरी तरह नहीं हो पा रहा है।
—घाटों और पर्यटक स्थलों पर खुलेआम उल्लंघन
शोध सर्वे में लंका क्षेत्र, बनारस के घाटों, प्रमुख पर्यटन स्थलों और प्रसिद्ध खान-पान की दुकानों को शामिल किया गया। क्षेत्रीय अवलोकन में पाया गया कि सड़क किनारे ठेले और दुकानों पर समोसे, चाय, नाश्ता और मिठाइयाँ आज भी पतली, निम्न-गुणवत्ता वाली और खाद्य-असुरक्षित प्लास्टिक शीट में दी जा रही हैं। उपयोग के बाद यही प्लास्टिक सड़कों, नालियों और अंततः गंगा नदी तक पहुंच जाता है। धूप, गर्मी और बार-बार उपयोग के कारण यह प्लास्टिक तेजी से टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है, जिससे पानी, मिट्टी और भोजन प्रदूषित हो रहे हैं।
——मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव
माइक्रोप्लास्टिक का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। विभिन्न शोधों में यह चाय, शहद, चीनी, फल-सब्ज़ियों और मछलियों में पाया गया है। ये कण जहरीले रसायनों और भारी धातुओं को अपने साथ लेकर चलते हैं और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक से आंतों में सूजन, लीवर संबंधी समस्याएँ और कोशिकीय क्षति हो सकती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
—समाधान पर ज़ोर
प्रोफेसर आनन्द चौधरी का कहना है कि प्लास्टिक संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास अनिवार्य हैं। प्लास्टिक और नॉन-स्टिक बर्तनों के उपयोग से बचना चाहिए, प्राकृतिक रेशों से बने कपड़ों को अपनाना चाहिए और प्लास्टिक के दुष्प्रभावों को लेकर व्यापक जन-जागरूकता आवश्यक है। साथ ही प्लास्टिक प्रतिबंध से जुड़े कानूनों का सख्ती से पालन और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के लिए कागज़, कपड़े या जैव-अपघटनीय पैकेजिंग को बढ़ावा देना समय की मांग है। यदि आज प्लास्टिक के उपयोग पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो माइक्रोप्लास्टिक आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गंभीर और अदृश्य स्वास्थ्य संकट बन सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी
