– धोखाधड़ी पर सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान

– अपील, पंजीकरण निरस्तीकरण और शास्ति वसूली की नई व्यवस्था प्रस्तावित
भराड़ीसैंण, 10 मार्च (हि.स.)। समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड, 2024 में व्यापक संशोधन के उद्देश्य से समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड (संशोधन) विधेयक, 2026 को ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में आयोजित बजट सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को सदन में प्रस्तुत किया गया। राज्य सरकार के अनुसार प्रस्तावित संशोधन नवीन आपराधिक कानूनों के अनुरूप प्रावधानों को समायोजित करने, प्रक्रियाओं को अधिक व्यवहारिक बनाने और दंडात्मक व्यवस्थाओं को स्पष्ट एवं सुदृढ़ करने के उद्देश्य से लाए गए हैं।
विधेयक में जहां-जहां ‘दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973’ का उल्लेख है, उसके स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 को प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव है। धारा 7, 10, 11 सहित अन्य संबंधित उपधाराओं में “छह माह” की समय-सीमा बढ़ाकर “एक वर्ष” किए जाने का प्रावधान है। धारा 12 में ‘सचिव’ के स्थान पर “अपर सचिव” शब्द रखा जाएगा। धारा 13(3) को पुनर्लेखित कर यह व्यवस्था की गई है कि उप-निबंधक द्वारा निर्धारित अवधि में कार्यवाही न करने पर प्रकरण स्वतः निबंधक और तत्पश्चात महानिबंधक को संदर्भित होगा।
दंड प्रावधानों में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तावित हैं। धारा 17(2) एवं धारा 32 में संशोधन कर अपराधों को भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अनुरूप दंडनीय बनाया गया है। बाल विवाह से जुड़े मामलों में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत कार्रवाई होगी। धोखाधड़ी, बल या दबाव से विवाह अथवा सहवासी संबंध स्थापित करने पर सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। अवैध विवाह विघटन, पुनर्विवाह में बाधा उत्पन्न करने तथा मिथ्या पहचान प्रस्तुत करने जैसे कृत्यों पर भी कड़े दंड निर्धारित किए गए हैं।
विधेयक में धारा 19क जोड़कर उप-निबंधक पर अधिरोपित शास्ति के विरुद्ध 30 दिवस के भीतर अपील का प्रावधान किया गया है। अपीलीय प्राधिकारी को आदेश पुष्ट, उपांतरित अथवा अपास्त करने की शक्ति दी गई है। सहवासी संबंधों से संबंधित धाराओं 384, 385 और 387 में संशोधन कर पंजीकरण, समाप्ति प्रमाण-पत्र तथा अवैध या धोखाधड़ीपूर्ण सहमति के मामलों में दंड व्यवस्था को और स्पष्ट किया गया है।
इसके अतिरिक्त, धारा 390 के बाद नई धारा 390क एवं 390ख जोड़ी जाएगी, जिसके तहत विवाह, विवाह-विच्छेद, सहवासी संबंध या उत्तराधिकार से जुड़े पंजीकरण निरस्त करने की शक्ति महानिबंधक को प्रदान की गई है, बशर्ते संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया जाए। शास्ति की वसूली भू-राजस्व के बकाये की भांति की जाएगी। अनुसूची-2 में ‘विधवा’ शब्द के स्थान पर ‘पति/पत्नी’ शब्द प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव भी शामिल है।
संशोधन प्रावधानों के तहत समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड (संशोधन) अध्यादेश, 2026 को निरस्त किया जाएगा, हालांकि अध्यादेश के अंतर्गत की गई कार्यवाहियों को वैध माना जाएगा। विधेयक के पारित होने पर अधिनियम तत्काल प्रभाव से लागू होगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय
