राेहित पारीक

कोविड-19 महामारी ने दुनिया को यह सिखाया कि एक सूक्ष्म वायरस भी पूरी मानव सभ्यता को चुनौती दे सकता है। साल 2020 में जब यह वायरस तेजी से फैला, तो अस्पतालों में मरीजों की भीड़, खाली पड़ी सड़कें और भय का माहौल पूरी दुनिया में दिखाई दिया। ऐसे समय में विज्ञान ने उम्मीद की किरण के रूप में कोविड वैक्सीन विकसित की, जिसने करोड़ों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
वैक्सीन अभियान मानव इतिहास के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में से एक था।
भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में अरबों खुराकें दी गईं और इससे संक्रमण व मृत्यु दर को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सका। हालांकि चिकित्सा विज्ञान यह भी मानता है कि किसी भी दवा या टीके के साथ बेहद दुर्लभ मामलों में दुष्प्रभाव की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
इसी संदर्भ में यह सवाल उठता रहा है कि यदि किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत लगाए गए टीके से किसी व्यक्ति को गंभीर नुकसान हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा।
इसी मुद्दे पर हाल ही में उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। 10 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि कोविड वैक्सीन से होने वाले गंभीर दुष्प्रभावों के मामलों में “नो-फॉल्ट कम्पनसेशन पॉलिसी” बनाने की संभावना पर विचार किया जाए।
इस प्रकार की नीति का अर्थ यह होता है कि प्रभावित व्यक्ति को मुआवजा पाने के लिए यह साबित नहीं करना होगा कि सरकार, वैक्सीन निर्माता कंपनी या डॉक्टर की गलती थी। केवल यह देखा जाएगा कि नुकसान वास्तव में वैक्सीन से जुड़ा है या नहीं। यदि वैज्ञानिक जांच में यह संबंध स्थापित होता है, तो पीड़ित को राहत दी जा सकती है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की थी कि कोविड वैक्सीन के दुष्प्रभावों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक नई विशेषज्ञ समिति बनाई जाए।
हालांकि अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि भारत में पहले से एडवर्स इवेंट फॉलोविंग इम्युनाइजेशन नामक वैज्ञानिक निगरानी प्रणाली मौजूद है, जो टीकों से जुड़े संभावित दुष्प्रभावों की जांच करती है। इसलिए अलग से नया विशेषज्ञ पैनल बनाने की आवश्यकता नहीं है।
अदालत का मानना है कि मौजूदा वैज्ञानिक व्यवस्था पर्याप्त है और उसी के आधार पर मामलों की जांच की जानी चाहिए। साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत बहुत बड़े स्तर पर टीकाकरण किया जाता है, तो उससे जुड़े दुर्लभ जोखिमों के लिए राहत व्यवस्था पर भी विचार होना चाहिए।
दरअसल, दुनिया के कई देशों में पहले से ही वैक्सीन से होने वाले दुर्लभ नुकसान के मामलों के लिए मुआवजा योजनाएं लागू हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लाभ के साथ-साथ संभावित जोखिमों की जिम्मेदारी भी संस्थागत रूप से स्वीकार की जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल कोविड वैक्सीन से जुड़े विवाद तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर इशारा करती है कि जब राज्य बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य अभियान लागू करता है, तो नागरिकों के भरोसे और सुरक्षा दोनों की जिम्मेदारी भी उसी पर होती है।
कोविड महामारी ने यह स्पष्ट किया कि विज्ञान, समाज और शासन के बीच विश्वास का रिश्ता कितना महत्वपूर्ण है। वैक्सीन ने करोड़ों लोगों को सुरक्षा दी, लेकिन न्याय व्यवस्था यह सुनिश्चित करना चाहती है कि यदि उस सुरक्षा कवच में कहीं दुर्लभ दरार भी रह जाए, तो उससे प्रभावित व्यक्ति को उचित सहारा मिल सके।
इसी दृष्टि से सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित
