हनुमान जयंती (02 अप्रैल) पर विशेष

-डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा
हनुमान जी महाराज, परात्पर ब्रह्म, सच्चिदानन्द स्वरूप, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के निष्ठावान सेवक, निष्काम भक्त और उनके अन्तरङ्ग पार्षद हैं। रामभक्ति के विग्रहवान स्वरूप श्री हनुमानजी भक्ति की उच्चतम पराकाष्ठा पर आसीन है और उनके जीवन में प्रेमा भक्ति, तात्विक ज्ञान और निष्काम कर्म योग का समुच्चय विद्यमान है।
श्री हनुमानजी राम मिलन के प्रमुख सेतु हैं और अपने आराधकों को जीवन के चरम लक्ष्य रामभक्ति की और अग्रसर करते हैं, वे रामभक्तों के परम आश्रय और संकटापन्न स्थिति में उनके संकटों का निवारण करते हुए उनके जीवन में शुभ मङ्गल का संचार करने वाले प्रत्यक्ष देवता कहे जाते हैं।
भगवान् श्रीराम की वनगमन लीला में एक प्रमुख पात्र के रूप में उनकी भूमिका अपने स्वामी श्रीराम के निष्ठावान सेवक के रूप में ही नहीं बल्कि कर्तव्य पथ पर पुत्र के समान आज्ञाकारी, बंधु के समान हितकारी, द्विविधा की स्थिति में गुरु के समान पथ प्रदर्शक तथा विषम परिस्थितियों में मित्र के समान सहयोगी के रूप में भी उल्लेख किए जाने योग्य है। वस्तुत: हनुमानजी जैसा निष्ठावान, समर्पित एवं निष्काम भक्त न तो सृष्टि में पहले कभी हुआ और न आगे कभी हो सकता है। उनके बगैर श्रीरामचरित का पूरी तरह बखान नहीं किया जा सकता।
विराट वैभव से परिपूर्ण श्री हनुमानजी विनयशील हैं और रामकाज में अत्यंत लघु रुप धारण कर लेते हैं। हनुमानजी भगवान् श्रीराम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो वे अत्यंत लघु रूप में आकाश मार्ग से गमन करते हुए लंका पहुंचे।
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि लंका की भूमि पर कदम रखने के पहले जहां उन्होंने अपने स्वामी श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका की सीमा में प्रवेश किया, वहीं जब लंका नगरी में माता सीता की खोज शुरू की, तब भी लघु रूप धारण कर सर्वप्रथम अपने स्वामी श्रीराम का स्मरण करते हुए सीताजी का अनुसंधान करने लगे।
हनुमानजी शुद्ध भक्त हैं इसलिए अहंकार रहित हैं और उनके द्वारा रामकाज निष्पादन हमें प्रेरित करता है कि किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए छोटा हो जाना ही ठीक है। अहंकार महान् उद्देश्यों की पूर्ति में सदैव बाधक होता है, परिणामस्वरूप अहंकार से कोई महान् कार्य अपने मुकाम पर पहुंचने में पूरी तरह सफल नहीं होता इसलिए हनुमानजी अपने स्वामी श्रीराम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो अपने मुख में राम नाम की विराट सत्ता को स्थापित कर लिया किंतु अपने स्वरूप को अत्यंत लघु आकार देते हुए लंकापुरी में सीता माता की खोज करने लगे।
धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान् शिव द्वारा अपने स्वामी श्रीराम की सेवा की तीव्र अभिप्सा के निमित्त उन्होंने ग्यारहवें रुद्र के रूप में वायुदेव केसरी और देवी अञ्जना के पुत्र हनुमान के रूप में जन्म लिया और भगवान् श्रीराम की सेवा की अपनी अभिलाषा पूरी की। पुराणों के अनुसार चूंकि भगवान् विष्णु ने रामावतार में पुरुष रुप धारण किया था और भगवान् शिव उनकी सेवा के अभिलाषी थे, ऐसे में यदि मनुष्य रूप में जन्म लेकर सेवा करते तो यह दास भाव के अनुकूल नहीं होता इसलिए उन्होंने मनुष्य से निम्नतर वानर योनि में जन्म लेकर दास भाव से अपने स्वामी भगवान् श्रीराम की सेवा की।
श्रीरामचरितमानस के अनुसार हनुमानजी ने गतिमान सूर्यदेव से तादात्म्य स्थापित करते हुए उनसे शिक्षा ग्रहण की, अपने दिव्य गुणों से वे सूर्यदेव के भी स्नेह भाजन हुए और उनसे प्रखर बुद्धि, दिव्य ज्ञान सहित तेज, ओज, बुद्धि और बल पा गए।
वाल्मीकि रामायण में महर्षि वाल्मीकि एवं हनुमान बाहुक में गोस्वामी तुलसीदास वर्णन करते हैं कि जब श्री हनुमान विद्या अध्ययन हेतु भगवान् सूर्य के पास गए तो सूर्यदेव ने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि मैं सदैव गतिमान हूं और तुम्हारे लिए मेरे सामने बैठना संभव नहीं इसलिए मैं तुम्हे कैसे शिक्षा दूंगा? तभी हनुमानजी ने सूर्याभिमुख होकर आकाश मार्ग में गमन करना शुरू कर दिया और उनके समक्ष उनसे संपूर्ण शिक्षा ग्रहण की। उधर स्वर्ग स्थित देवताओं ने जब यह अद्भुत एवं विस्मयकारी दृश्य देखा तो सब के सब हतप्रभ रह गए और हनुमानजी के धैर्य, शौर्य, साहस और वीरता की प्रशंसा करने लगे।
हमारे वेद्, उपनिषद् एवं पौराणिक ग्रंथों में भगवान् श्रीराम के पावन नाम की बड़ी महिमा का बखान किया गया है और हनुमानजी महाराज तो भगवान् श्रीराम के अतिप्रिय दास हैं, रुद्रावतार हैं और रुद्र अर्थात शिव सतत रामनाम में ही रत रहते हैं, ऐसे में रुद्रावतार हनुमानजी हर क्षणांश अपने प्रभु के नाम का ही स्मरण किया करते हैं।
श्री बुधकौशिक मुनि रामरक्षा स्तोत्र में भगवान् शिव और माता पार्वती के बीच हुए संवाद का उल्लेख करते हुए, रामनाम की महिमा का वर्णन करते हैं-राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्र नाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने।।
अर्थात है देवी ! राम राम राम इस प्रकार तीन बार राम नाम का उच्चारण सहस्त्र नाम के तुल्य है इसलिए मैं सदैव राम नाम में ही रमण करता हूं ।
श्री हनुमानजी पर ब्रह्म एवं शक्ति की महती कृपा थी और वे इसी शक्ति से अनुप्राणित हुए। वाल्मीकि कृत रामायण सहित अन्य पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि भगवान् श्रीराम और भगवती सीता द्वारा प्रदत्त आशीर्वाद से श्री हनुमानजी अजर अमर हैं और कल्प पर्यन्त पृथ्वी लोक में उनका निवास बना रहेगा।
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार भगवान् श्रीराम के आज्ञानुसार सीता माता की खोज कर लौटे हनुमानजी को प्रभु ने अपना सर्वस्व कहा जाने वाला दिव्य आलिंगन प्रदान कर उन्हें कृत-कृत कर दिया और जब प्रभु अपनी लीलाओं का संवरण कर अपने नित्य धाम जाने लगे तब उन्होंने हनुमानजी को कहा कि हनुमान! तुम मेरी कथा में ही मेरी भावना कर कल्प पर्यन्त इस पृथ्वी लोक पर निवास करते हुए स्वयं मेरी कथा सुनना और रसिकों को भी सुनाया करना।
ऋषि वाल्मीकि के अनुसार भगवान् श्रीराम ने हनुमानजी को कहा कि जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं स्थिर रहेंगी और जब तक मेरी कथा संसार में रहेगी, तुम्हारे शरीर में प्राण रहेंगे और तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी। भगवान् श्रीराम की कृपा के साथ ही सीताजी ने भी हनुमानजी पर कृपा करते हुए उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया कि है तात्! तुम बल और शील के निधान, अजर अमर और गुणों की निधि होओ और श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें।
श्रीमद्भागवत महापुराण में शुकदेव मुनि, राजा परीक्षित को कहते हैं कि राजन् ! किम्पुरुष वर्ष में भगवान् श्री राम के चरणारविन्दों की सन्निधि के रसिक परम भागवत श्री हनुमानजी अन्य किन्नर गणों सहित भक्ति पूर्वक उनकी उपासना करते हैं। वहां अन्य गंधर्वों सहित आर्ष्टिषेण अपने स्वामी भगवान् श्री राम की परम कल्याणमयी गुणगाथाओं का गान किया करते हैं, हनुमानजी उस कथा का श्रवण करते हैं और अपने प्रभु की स्तुति में मग्न रहते हुए रसिकों को भी राम कथा रुपी अमृत प्रदान करते हैं।
परब्रह्म श्रीराम और आद्या शक्ति सीता के कृपा प्राप्त श्री हनुमानजी महाराज अजर अमर हैं, सब युगों में वर्तमान है और अपने आराधकों को संरक्षण प्रदान करते हुए उन्हें रामभक्ति पथ पर अग्रसर करते हैं, वे रामकथा के अमर गायक हैं। यद्यपि हनुमानजी की विद्यमानता व्यापक रूप से सब जगह है, तथापि जहां-जहां राम का कीर्तन गाया जाता है, वहां वे मौजूद होते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं-
यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं, तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसांतकम्।।
अर्थात जहां-जहां रघुनाथ श्रीराम का कीर्तन, स्मरण, जप या कथा होती है, वहां-वहां नेत्रों में अश्रुपूरित आनंद लिए हनुमानजी उपस्थित हो जाते हैं। ऐसे राक्षसों के लिए काल स्वरूप श्री हनुमानजी को प्रणिपात किया जाना चाहिए।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)———–
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा
