-मनोज कुमार मिश्र

दिल्ली और एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में बेहिसाब बढ़ती आबादी के लिए बिजली, पानी, आवास, रोजगार और आवागमन को साधन से लेकर साफ हवा उपलब्ध कराना सरकारों के लिए दिन-प्रतिदिन बड़ी चुनौती बनती जा रही है। सड़कों से वाहनों की भीड़ को कम करने में दिल्ली की लाइफ लाइन (जीवन रेखा) कही जाने वाली और अब चार सौ किलोमीटर की सीमा पार कर रही मेट्रो रेल भी नाकाफी साबित हो रही है।
इसी 24 मार्च को दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्ली की भाजपा सरकार का 1,03,700 करोड़ का दूसरा बजट पेश करते हुए इसे हरित बजट का नाम दिया और इसका 21 फीसदी हिस्सा दिल्ली को प्रदूषण कम करने पर खर्च किए जाने की जानकारी दी। इस बजट में प्रदूषण कम करने के लिए ई-वाहनों पर जोर देने की घोषणा की। इसी नीति के तहत दिल्ली में छोटी देवी बसें चलाई जा रही है और ई-वाहनों के लिए आसानी से अनुमति देने का प्रावधान किया गया है। लेकिन बजट में दिल्ली की सड़कों पर पहले से अराजक तरीके से चल रही बेहिसाब ई-रिक्शा के परिचालन के लिए कोई नियम बनाने के प्रस्ताव की जानकारी नहीं दी गई। दिल्ली-एनसीआर में पंजीकृत डेढ़ करोड़ से ज्यादा वाहनों की तादाद कम करने की ठोस योजना नहीं बताई गई। इन वाहनों की भीड़ ने कभी दिल्ली की जीवन रेखा कही जाने वाली बस सेवा को बेहाल कर दिया।
सड़कों पर बसों की तादाद लगातार कम हो रही है। वाहनों की भीड़ में बसों की औसत गति 10 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई है। पर्यावरण पर काम करने वाली मशहूर स्वयंसेवी संस्था सीएसई (विज्ञान और पर्यावरण केन्द्र) की रिपोर्ट के मुताबिक इस शताब्दी की शुरुआत तक दिल्ली में सार्वजनिक वाहन का उपयोग करने वालों में 65 फीसदी लोग बसों में यात्रा करते हैं। अब यह संख्या बीस फीसदी से कम हो गई है। दिल्ली परिवहन विभाग के पूर्व उपायुक्त अनिल छिकारा इसे दूसरी तरह से बताते हैं। जब दिल्ली की आबादी 1 करोड़ 20 लाख थी तब 45 लाख लोग हर रोज बसों से यात्रा करते थे, अब आबादी तीन करोड़ से ज्यादा है तब यह संख्या 28 लाख यात्रियों तक है। यह भी तब है जब महिलाओं के लिए बसों में फ्री यात्रा की सुविधा है। इसका बड़ा कारण बसों की अनुपलब्धता और बसों की औसत गति दस किलोमीटर तक आने से है।
वहीं, बस एकता मंच के प्रवक्ता श्याम लाल गोला कहते हैं कि सरकारें न तो बस खुद चला पा रही है और न ही हमें चलाने दे रही है। हम सरकार की हर शर्त मानने को तैयार हैं लेकिन बसों के लिए जो रवैया पिछली सरकार का था, वही अभी तक इस सरकार का दिख रहा है। उनका कहना है कि `हम पहले की तरह किलोमीटर स्कीम में चलने को तैयार हैं या सीएनजी अनिवार्य करने पर अदालत के संज्ञान में बने 17 कलस्टर में सहकारी आधार पर निजी बसों की कंपनी बनाकर बसें चलाने को तैयार हैं। वैसे, अब 11 हजार से ज्यादा बसें चलानी होगी लेकिन पहले सरकार दिल्ली हाई कोर्ट में दिए अपने उसी हलफनामे के आधार पर आधी बसें खुद चलाए और आधी निजी बस आपरेटरों से चलवाए।’
एक नवंबर, 1996 को सीएसई ने एक शोधपरक लेख छापा जिसमें बताया गया कि वाहन प्रदूषण के मामले में दिल्ली देश में पहले नंबर पर है। इस पर संज्ञान लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 18 नवंबर को दिल्ली सरकार को नोटिस दिया और इस बारे में कार्ययोजना पेश करने को कहा। इसी बीच सीएसई ने 01 नवंबर, 1997 को देश और दुनिया के वैज्ञानिकों की जन सुनवाई आयोजित की। उसमें यह भी बताया गया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों पर कोई काम नहीं कर रही है। इस पर दोबारा सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को नोटिस दिया। दिसंबर में केन्द्र सरकार ने इस पर एक श्वेत पत्र जारी किया। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा-3 के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के लिए विशेष एजेंसी-पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण गठित करने के निर्देश दिए।
इस प्राधिकरण के अध्यक्ष बेहद ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पूर्व नौकरशाह भूरेलाल बनाए गए। इसे बाद में भूरेलाल कमेटी कहा जाने लगा। इसी कमेटी की शुरुआती रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई 1998 को आदेश दिया कि दिल्ली में चलने वाले सभी बसों को धीरे-धीरे सीएनजी पर लाया जाए। इसकी तारीख 31 मार्च 2001 तय की गई। सरकारें एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालती रहीं तो अप्रैल 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा सख्त आदेश दिए। उसके बाद सीएनजी पर बसों और व्यवसायिक वाहनों को लाने की प्रक्रिया तेज हुई।
कायदे में 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में मिले पैसों से दिल्ली की सड़कों पर बसें दिखने लगी। दिल्ली सरकार ने हाई कोर्ट में 11 हजार बसें चलाने का हलफनामा दे रखा है लेकिन अब तो पुरानी बसें भी सड़कों पर से हटने लगी, बसों की संख्या गिनती की रह गई हैं। दिल्ली के विशेष परिवहन आयुक्त रहे ए के सिंह कहते हैं कि बसों के माध्यम से कम खर्च में लास्ट माइलेज कनेक्टिविटी(घर तक पहुंचने की व्यवस्था) हो सकती है। इसके लिए पूरी संख्या में आरामदायक बसों को सड़क पर लाना होगा। यह सुनिश्चित हो कि वे बसें तय समय से चलें और तय समय में यात्री अपने मंजिल पर पहुंच जाए। उसकी गति भले ही मेट्रो रेल जितनी न हो लेकिन उसके आसपास होनी चाहिए। इसके लिए सबसे पहले बड़ी संख्या में बसें सड़कों पर लानी होगी और सड़कों पर जाम का मुख्य कारण बनी ई-रिक्शा का पंजीकरण करके आटो के साथ उसे व्यवस्थित करना होगा। दिल्ली की नई सरकार ने कुछ बसें चलाई हैं लेकिन वह नाकाफी है। डीटीसी के अधीन चलने वाली निजी बसें ही सड़कों पर दिख रही है।
दिल्ली मेट्रो अपनी गति से चल रही है। अभी दिल्ली मेट्रो का दायरा 416 किलोमीटर है। चौथे पांचवें चरण के पूरा होते ही यह दायरा 104 किलोमीटर जुड़कर 520 किलोमीटर पार कर जाएगी। अब तो पांचवें चरण की भी सरकार ने मंजूरी देकर बजट आवंटित कर दिए हैं। येलो लाइन के उद्घाटन समारोह में मेट्रो मैन नाम से मशहूर डीएमआरसी (दिल्ली मेट्रो) के पहले प्रबंध निदेशक ई.श्रीधरन ने कहा था कि उनकी योजना मेट्रो रेल को हर मोहल्ले से केवल पांच सौ मीटर दूर तक पहुंचाना है। वैसे अभी तो किसी भी तरह यह लक्ष्य असंभव लग रहा है। डीएमआरसी का गठन एक स्वशासी निकाय के रूप में हुआ। इसकी स्थापना 03 मई, 1995 में हुई। मेट्रो का परिचालन 2002 से शुरू हुआ। दिल्ली सरकार और भारत सरकार का शहरी विकास मंत्रालय इसमें साझा रुप से है और इसको जापान की एक कंपनी जीआईसीए (जापान इंटरनेशनस कोआपरेशन एजेंसी) ने आसान शर्तों पर कर्ज दिया। कर्ज का भुगतान तीस साल की लंबी अवधि में करने की सुविधा है। इस संस्था ने देश के कई और मेट्रो परियोजना को भी कर्ज दिया है। बाकी धन डीएमआरसी अपने संसाधन से जुटाती है।
किराया बढ़ाने और यात्रियों की हर रोज औसत संख्या 65 लाख रहने के बावजूद मेट्रो अभी भी घाटे में है। उसने 23 साल के परिचालन के बाद केवल परिचालन को घाटे से उबार लिया है। मेट्रो का न्यूनतम किराया 11 रुपए और अधिकतम 62 रुपए है। बस का किराया कम है। दावा भले ही किया जाए लेकिन मोहल्लों तक मेट्रो रेल को ले जाना आसान नहीं है। शुरु में मेट्रो निर्माण का खर्च जमीन पर सवा सौ करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर, धरती से ऊपर डेढ़ सौ करोड़ रुपए और जमीन के अंदर पौने दो सौ करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर था। एक तो अब जमीन पर मेट्रो के लिए जगह कम बची है। जमीन के ऊपर का खर्च छह सौ करोड़ प्रति किलोमीटर और जमीन के नीचे सात सौ से आठ सौ करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर बताया जा रहा है। ऐसे में निकट भविष्य में जापान से कर्ज मिलना बंद होने पर आर्थिक संकट भी हो सकता है।
फिर भी मेट्रो रेल दिल्ली के लिए लाइफ लाइन बन चुका है और कोई सार्वजनिक परिवहन इसका विकल्प नहीं बनता है। दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के लिए दिल्ली सरकार ने 2005 में राइड्स से सर्वे कराया था। जिसमें कई तरह के परिवहन प्रणाली चलाने के सुझाव दिए गए थे। उसी में दिल्ली की लोकल ट्रेन को मुंबई की तरह और विकसित करने का सुझाव दिया गया था। उस पर अमल नहीं हुआ। फिर तो मेट्रो के साथ बस को जोड़ने के विकल्प पर काम हुआ लेकिन उसके कारगर न होने से ही दिल्ली की सड़कों पर सर्वाधिक दोपहिया वाहन चल रहे हैं। बसों का ठीक से परिचालन कर दुपहिया वाहन चालकों को बसों में यात्रा के लिए लाया जा सकता है। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की कमी के चलते संभव है वह अपने वाहन से यात्रा कर रहा है। ऐसे में सड़कों पर से वाहनों की भीड़ कम होना कठिन है। हालांकि दिल्ली पर यातायात का दबाव कम करने के लिए केंद्र सरकार ने ईस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेसवे, वेस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे बनाया। दिल्ली-मेरठ नमो भारत रेल कोरिडोर के बाद दिल्ली-करनाल और दिल्ली-अरवल कोरिडोर बनने वाला है। इन सभी का लाभ दिल्ली को होगा ही।
दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा है। लाखों वाहन एनसीआर के दूसरे राज्यों में पंजीकृत हैं, जो हर रोज दिल्ली में चलते हैं। इसलिए कोई भी योजना पूरे एनसीआर के लिए बनाने के बाद ही प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है। प्रदूषण के संकट के स्थाई समाधान के लिए दिल्ली को केन्द्र सरकार और पड़ोसी राज्यों का सक्रिय सहयोग जरूरी है। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली बेहतर हो ताकि सड़कों से निजी वाहनों की संख्या कम की जा सके। सड़कों को जाम से मुक्त करने के ठोस प्रयास हों। दिल्ली में बाहर से आने वाले वाहनों से प्रदूषण कम करने के मानकों पर अमल करवाया जाए। प्रदूषण फैलाने वाले किसी भी उद्योग को दिल्ली में नहीं चलने दिया जाए। दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण रोकने के मानकों पर कड़ाई से अमल हो। पर्यावरण को राजनीतिक मुद्दे की बजाए आमजन के जीवन बचाने का मुद्दा बनाया जाए। अब चालू समाधान नहीं, स्थाई समाधान खोजने की जरूरत है। शुरुआत सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को ठीक करके किया जा सकता है। फिर प्रदूषण फैलाने वाले अन्य कारणों का समाधान खोजा जा सकता है। वैसे इसके प्रयास होते दिख रहे हैं। जरूरी उसे धरातल पर उतारने का है।
(लेखक, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
